दशहरा के मावली परघाव में शामिल होने के लिए दंतेवाड़ा से जगदलपुर पहुंची माता मावली की डोली और दंतेश्वरी
के छत्र को बस्तर वासियों
ने आज बुधवार शाम भव्य स्वागत किया गया। मावली माता की डोली और
दंतेश्वरी के छत्र को जिया डेरा
से दंतेश्वरी मंदिर तक
पहुंचाने में हजारों लोग सड़क के दोनों ओर मौजूद रहे। बस्तर दशहरा के मावली परघाव
में की अगुवानी
बस्तर की जनता के साथ राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव, उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा सहित स्थानीय जनप्रतिनिधियाें ने किया। बस्तर दशहरा का सबसे महत्वपूर्ण
पूजा विधान मावली परघाव में बस्तर संभाग के 194 गांव के देवी-देवता शामिल हुए। इस दाैरान माता मावली के डाेली के आगे देवी-देवताओं का काफिला की भव्यता बस्तर दशहरा अपने चरम पर पंहुचने का विहंगम दृश्य आकर्षक हाेता है। परंपरानुसार बस्तर दशहरा के मावली परघाव में भव्य स्वागत के बाद मां दन्तेश्वरी मंदिर में माता मवली की डाेली काे लाकर स्थापित किया गया।
माता
मावली की डोली तथा मां दंतेश्वरी का छत्र बीती मंगलवार देर रात दंतेवाड़ा से जगदलपुर पहुंचने पर नियत स्थान जिया डेरा में स्थापित
किया गया था। जिसके बाद आज बुधवार देर शाम में परंपरानुसार मावली परघाव में भव्य स्वगत के बाद मां दन्तेश्वरी मंदिर में लाकर स्थापित किया गया। मंदिर में 18 अक्टूबर तक मावली माता की डोली और दंतेश्वरी के छत्र के दर्शन होंगे,
19 अक्टूबर को मावली माता की विदाई के भव्य आयोजन के साथ वापस दंतेवाड़ा रवाना
होगी।
दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी ने बताया कि मावली देवी की अगुवानी या स्वागत को स्थानिय बोली में मावली परघाव कहा जाता है।
उन्होंने बताया कि मावली
परघाव पूजा विधान
में दंतेवाड़ा
में नए कपड़े में चंदन का लेप देकर मावली की मूर्ति बनाकर पुष्पाच्छादित किया जाता है। इस मूर्ति
को ही डोली में विराजित कर दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाया गया, माता मावली अपने साथ नए अन्न भी लाई है। इस
अन्न से ही बस्तर राजपरिवार
कुम्हड़ाकोट जंगल में शुक्रवार तीन अक्टूबर को
नवाखानी त्योहार मनाएगा।
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