‘हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं बन सकता। हर व्यक्ति हर पीठ के आचार्य के रूप में जाकर यहां-वहां वातावरण खराब नहीं कर सकता। उन मर्यादाओं का पालन सबको करना होगा। कानून से ऊपर कोई नहीं।’–योगी आदित्यनाथ, सीएम यूपी ‘मैं प्रार्थना कर सकता हूं कि वे विवाद समाप्त कर संगम में स्नान करें। शंकराचार्य भगवान के चरणों में प्रणाम। ये जो ढोंगी शंकराचार्य मामले में घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं, ये संतों के द्रोही हैं, हिंदुओं के द्रोही हैं।’–केशव प्रसाद मौर्य, डिप्टी सीएम ‘चोटी नहीं खींचनी चाहिए थी। जो भी दोषी है, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। चोटी खींचना महाअपराध है। देखिएगा महापाप लगेगा।’–ब्रजेश पाठक, डिप्टी सीएम प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य के अपमान और उनके शिष्यों की चोटी खींचकर की गई पिटाई प्रकरण में ये तीन बयान सीएम और दोनों डिप्टी सीएम के हैं। सवाल है कि एक तरफ सीएम का स्टैंड क्लियर है। फिर उनके दोनों डिप्टी सीएम क्यों नई लकीर पर चलने की कोशिश कर रहे? क्या ये सारी कार्रवाई भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के दखल के बाद हो रही? क्या शंकराचार्य विवाद के चलते सूबे में ब्राह्मणों की नाराजगी को दूर करने की ये कवायद है? या सरकार के अंदर ही इस मुद्दे को लेकर और विवाद गहराने के संकेत हैं? पढ़िए ये रिपोर्ट…. यूपी भाजपा से ब्राह्मणों की नाराजगी क्यों अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे के तौर पर सामने आया ब्राह्मणों का गुस्सा
यूपी भाजपा में ब्राह्मण नेतृत्व का वैक्यूम है। पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्रा के बाद कोई ऐसा सक्रिय ब्राह्मण नेता भाजपा में नहीं, जिसके साथ प्रदेश के ब्राह्मण खुद को जोड़ सकें। भाजपा में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक समेत 7 मंत्री हैं। बावजूद इसके शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन लखनऊ में ब्राह्मण विधायकों की बैठक के बाद जिस तरीके से संगठन के स्तर से चेतावनी दी गई। उससे ब्राह्मणों में संदेश गया कि भाजपा सरकार में उनको उचित सम्मान नहीं मिल रहा। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपमान मामला और फिर उनके शिष्यों की चोटी खींचकर की गई पिटाई ने ब्राह्मणों की नाराजगी और बढ़ा दी। रही-सही कसर यूजीसी विवाद ने पूरी कर दी। इस तीनों प्रकरणों से साफ संदेश गया कि प्रदेश की भाजपा सरकार में ब्राह्मण उपेक्षित हैं। ब्राह्मणों की नाराजगी बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे के तौर पर सामने आई। ब्राह्मणों की नाराजगी को भुनाने में जुटी हैं सपा-बसपा
इन तीनों प्रकरणों पर भाजपा का एक भी ब्राह्मण मंत्री कुछ नहीं बोला। यहां तक कि डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक भी चुप रहे। असर यह हुआ कि सपा और बसपा जैसी पार्टियां ब्राह्मणों की नाराजगी को भुनाने में सक्रिय हो गईं। दोनों ही पार्टी के प्रमुखों ने ब्राह्मणों को अपने पाले में आने का न्योता तक दे दिया। ब्राह्मणों की नाराजगी से भाजपा असहज महसूस कर रही। 2022 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों का 89% समर्थन उसे मिला था। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मणों की नाराजगी भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकती है। इसका खामियाजा भाजपा के उन ब्राह्मण नेताओं को भी उठाना पड़ सकता है, जो अब तक इन मामलों पर खामोश रहे। …तो ब्रजेश पाठक दिल्ली के इशारे पर हुए सक्रिय सीएम योगी ने 13 फरवरी को राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान सदन में शंकराचार्य के अस्तित्व पर सवाल उठाए। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई को उचित ठहराया। इस बयान पर पहली बार ब्रजेश पाठक ने जुबान खोली। 17 फरवरी को ब्रजेश पाठक ने चोटी खींचना महाअपराध वाला बयान दिया था। पार्टी से जुड़े सोर्स बताते हैं कि ब्रजेश पाठक ने ऐसा बयान दिल्ली में अपने नेताओं से बात करने के बाद दिया। दिल्ली से हरी झंडी मिलने के बाद ही पाठक ने अब तक के सबसे तल्ख अंदाज में पहली बार बयान दिए। फिर दो दिन बाद 19 फरवरी को अपने घर पर 101 बटुकों को बुलाकर शिखा पूजन करके सम्मानित करना भी उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा। सोर्स बताते हैं कि देर-सवेर ब्रजेश पाठक शंकराचार्य से भी मिलेंगे। वह प्रयागराज माघ मेले में हुए उनके अपमान को लेकर माफी मांगेंगे। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- ब्रजेश पाठक ने पहले तल्ख अंदाज में बयान देकर और अब 101 बटुकों को सम्मानित करके भाजपा के अंदर सक्रिय ब्राह्मण लीडरशिप में लंबी लकीर खींची है। साथ ही ब्राह्मण समाज को यह संदेश देने की कोशिश की है कि सरकार में उनका ध्यान रखने वाला, उनकी बात सुनने वाला और उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाला कोई है। इसके 2 मैसेज साफ हैं। पहला- ब्रजेश पाठक के रूप में पार्टी को ब्राह्मण नेतृत्व मिलेगा, जिसके साथ प्रदेश के ब्राह्मण खुद को जोड़कर पार्टी से जुड़े रहेंगे। दूसरा- शंकराचार्य और यूजीसी विवाद के चलते हुए नुकसान का डैमेज कंट्रोल हो सकेगा। दैनिक भास्कर पोल में हिस्सा लेकर राय दें-
पाठक पहले भी ब्राह्मण मुद्दे पर मुखर हो चुके हैं
ऐसा नहीं है कि ब्रजेश पाठक ने पहली बार तल्ख बयान दिया है। वह योगी सरकार के पहले कार्यकाल में भी ब्राह्मणों के कई मुद्दों पर मुखर रह चुके हैं। एक घटना तो राजधानी लखनऊ से जुड़ी है। तब पुलिस सिपाही की गोली से एप्पल कंपनी में मैनेजर विवेक तिवारी की मौत हो गई थी। पुलिस इसे एक्सीडेंट बताने में जुट गई थी। तब ब्रजेश पाठक के हस्तक्षेप के बाद पुलिस को हत्या का प्रकरण दर्ज करना पड़ा। सरकार को मृतक की पत्नी को नगर निगम में ओएसडी की नौकरी और आर्थिक मदद देनी पड़ी थी। इसी तरह रायबरेली में 3 ब्राह्मणों की हत्या मामले में भी उनके दखल के बाद पुलिस को आरोपियों को गिरफ्तार करना पड़ा था। फिर कानपुर में ब्राह्मणों की हत्या मामला सामने आया। तब भी ब्रजेश पाठक के दखल के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की थी। यही कारण रहा कि जब योगी का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ, तो पार्टी ने ब्रजेश पाठक का कद बढ़ाते हुए डिप्टी सीएम बनाया। पार्टी की मंशा थी कि वे भाजपा में बड़े ब्राह्मण नेता के तौर पर स्थापित होंगे। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- ब्रजेश पाठक अभी तक खुद को भाजपा में बड़े ब्राह्मण नेता के तौर पर स्थापित नहीं कर पाए थे। लेकिन, सदन में सीएम योगी के बयान के बाद उनकी तल्ख टिप्पणी और अब 101 बटुकों को सम्मानित करके उन्होंने खुद को भाजपा में ब्राह्मण नेता के तौर पर स्थापित करने का प्रयास किया है। बसपा में सतीश चंद्र मिश्रा के बाद होती थी गिनती
राजेंद्र कुमार कहते हैं- ब्रजेश पाठक जब तक बसपा में रहे, उनकी पहचान ब्राह्मण नेता के तौर पर ही थी। तब सतीश चंद्र मिश्रा के बाद वे दूसरे बड़े ब्राह्मण नेता थे। भाजपा में शामिल हुए, तो सिर्फ एक बसपा नेता के तौर पर आए थे। क्योंकि, तब भाजपा में कई बड़े ब्राह्मण नेता थे। लेकिन, शंकराचार्य पर की गई सदन में टिप्पणी के बाद ब्रजेश पाठक को एक अवसर मिला है। वह न सिर्फ अपना कद बढ़ाते हुए नजर आ रहे, बल्कि संकट में फंसी पार्टी को भी ब्राह्मणों की नाराजगी के बाद डैमेज कंट्रोल करने में जुटे हैं। दोनों डिप्टी सीएम का प्रयास डैमेज कंट्रोल माना जा रहा
शंकराचार्य के अपमान और बटुकों की चोटी खींचकर की गई पिटाई फिर यूजीसी विवाद से सूबे का ब्राह्मण भाजपा से गहरे तक नाराज है। वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश बाजपेयी कहते हैं- यह कोई पहली बार नहीं, जब भी भाजपा में कोई बड़ी चूक होती है, तो इसी तरह डैमेज कंट्रोल किया जाता है। यह रणनीतिक तौर पर भी सही है। भाजपा अनुशासित पार्टी है। यहां कोई अपनी अलग लकीर नहीं खींच सकता। सब कुछ संगठन और सरकार के सर्वमान्य निर्णय से होता है। सदन में योगी आदित्यनाथ ने भी कोई गलत बयानबाजी नहीं की। उन्होंने यही तो कहा कि एग्जिट गेट से कैसे प्रशासन शंकराचार्य को जाने देते? यह भी सच है कि शंकराचार्य वहां राजनीति कर रहे थे। नहीं तो क्या कारण था कि जब प्रशासन ने माफी मांगते हुए संगम स्नान की पहल की तो वे बिना नहाए ही लौट गए। प्रशासन के लोगों ने माफी मांगी, तो तय है कि ये भी सीएम की पहल से ही हुआ होगा। क्या है शंकराचार्य अपमान और चोटी विवाद 18 जनवरी मौनी अमावस्या पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों के साथ पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे। पुलिस ने भीड़ का हवाला देकर उन्हें संगम से पहले रोक दिया और कहा कि पालकी छोड़कर पैदल जाए। इसका शंकराचार्य सहित उनके शिष्यों ने विरोध किया, जो बाद में झड़प में तब्दील हो गया। बाद में पुलिस ने शंकराचार्य के शिष्यों की चोटी खींचकर बेरहमी से पिटाई की थी। इस प्रकरण से नाराज शंकराचार्य धरने पर बैठ गए थे। 10 दिनों के धरने के बाद बिना स्नान किए ही माघ मेला छोड़ दिया था। पढ़िए, ब्राह्मण वोट भाजपा के लिए कितना जरूरी प्रदेश में 9 से 11 फीसदी ब्राह्मण समाज की आबादी है। मौजूदा 75 जिलों में 31 में ब्राह्मण प्रभावी भूमिका में हैं। पूर्वांचल, मध्य और बुंदेलखंड में ब्राह्मण समाज जिसके साथ जाता है, उसी की ताजपोशी भी तय मानी जाती है। ब्राह्मण हमेशा से महत्वपूर्ण स्विंग वोटबैंक रहे हैं। ये मतदाता अक्सर चुनावों का रुख तय करते हैं। इसकी वजह भी है, ये सामाजिक-आर्थिक रूप से सशक्त हैं। मुखर होने की वजह से अन्य जातियों को भी प्रभावित करते हैं। जब भी ब्राह्मण वोटर किसी पार्टी या गठबंधन के साथ मजबूती से जुड़े, तो उस पार्टी को बड़ा फायदा हुआ। बस समस्या ये है कि ये कभी भी एक पार्टी के साथ लंबे वक्त तक स्थाई रूप से जुड़े नहीं रह सके। ओप इंडिया के अनुसार, बलरामपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, महराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, चंदौली, कानपुर नगर, कानपुर देहात, प्रयागराज, जौनपुर, बांदा, बलिया और सुल्तानपुर समेत 31 जिलों की 115 सीटें ब्राह्मण प्रभाव वाली हैं। यहां 30 हजार से 1 1.60 लाख तक ब्राह्मण वोटर हैं। कैसे कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा के सारथी बने ब्राह्मण देश की आजादी के बाद 1980 तक ब्राह्मण मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ रहे। लेकिन, राम मंदिर आंदोलन और मंडल कमीशन से ब्राह्मणों का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। ब्राह्मण पहली बार बड़ी संख्या में भाजपा के साथ जुड़े। फायदा यह हुआ कि 1991 में 221 सीटों के साथ भाजपा पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आ गई। बीच में जब भाजपा कमजोर हुई तो 2007 में ब्राह्मणय बसपा के साथ गया और वह 206 सीटों के साथ अकेले पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ गई। बसपा के सत्ता से हटने के बाद फिर ब्राह्मण भाजपा की ओर शिफ्ट हुए। 2014 के लोकसभा में भाजपा 51 सीटें जीतने में सफल रही। फिर 2017, 2019, 2022 और 2024 में ब्राह्मण पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में समर्पित रहे। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) की रिपोर्ट बताती है कि 2017 में 83%, तो 2022 के विधानसभा में 89% ब्राह्मणों का वोट भाजपा को मिला था। 2024 से शुरू हुई नाराजगी, नहीं रुकी तो भाजपा को 50 सीटों का नुकसान
2024 में ब्राह्मण वोटर एक बार फिर शिफ्ट होता दिखने लगा। भाजपा को भले ही 79% ब्राह्मणों का वोट मिला हो, लेकिन उनका 16% वोट महागठबंधन को भी गया। यह संकेत है कि भाजपा नहीं संभली तो उससे ब्राह्मणों का मोहभंग हो सकता है। एक्सपर्ट कहते हैं, 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में 114 सीटें ऐसी थीं, जिन पर जीत-हार का अंतर 10 हजार से कम था। इनमें से 15 सीटों पर तो एक हजार से भी कम का मार्जिन था। इन 114 सीटों में भाजपा 64 और उसके सहयोगी दलों में रालोद, निषाद पार्टी को 2-2 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं, सपा 35 सीटों पर जीती थी। बसपा और कांग्रेस की 1-1 सीट थी। प्रदेश में ब्राहणों की आबादी 9 से 11 प्रतिशत है। वहीं, विधानसभा में औसत वोटरों की संख्या 2.20 लाख थी। इस हिसाब से अनुमान लगाएं तो 10 प्रतिशत ब्राह्मणों की नाराजगी से 1 प्रतिशत वोट स्विंग होगा। मतलब, 2 हजार वोट भाजपा से कटेंगे। अगर 2022 की तरह ही टक्कर होती है, तो सीधे 12 से 15 सीटों का नुकसान भाजपा को हो सकता है। अगर 30 प्रतिशत भी ब्राह्मण वोट भाजपा से शिफ्ट हुआ, तो करीब 50 सीटों का नुकसान हो सकता है। ————————– ये खबर भी पढ़ें- अविमुक्तेश्वरानंद बोले- डिप्टी सीएम पाप धोने-पोंछने का काम कर रहे; योगी असली हिंदू या फिर वेशधारी शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सीएम योगी पर हमलावर हैं। उन्होंने गुरुवार को वाराणसी में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा- दोनों डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और केशव मौर्य भाजपा को हो रही क्षति को बचाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ये मठाधीश महाराज हठ पर उतारू हैं। कालनेमि कौन है? पढ़िए पूरी खबर…
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