लार्जर बेंच तय करे कि आर्थिक अपराध और जघन्य अपराधों के आरोपितों के गिरफ्तारी वारंट अधिकार के रूप में जमानती में बदले जा सकते हैं या नहीं

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अदालत ने कहा कि राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों में सरकार भारी भरकम राशि खर्च करती है। इसमें संदेह नहीं की देश ने प्रगति की है, लेकिन विकास परियोजनाओं के लिए निर्धारित धन का एक बडा हिस्सा सफेदपोश अपराधियों ने अवैध गतिविधियों में शामिल होकर हथिया लिया है। मामले में आरोपित को इस सिर्फ इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती कि मामले में अपराध के लिए पांच साल की सजा है। अदालत ने कहा कि देश का आम आदमी विकास के लिए सीजीएसटी और एसजीएसटी सहित सभी प्रकार के करों का भुगतान कर रहा है, लेकिन याचिकाकर्ता जैसे लोग फर्जी फर्म बनाकर देश के विकास में बाधा डाल रहे हैं और सरकारी खजाने को 10.65 करोड़ रुपए का भारी भरकम नुकसान पहुंचा रहे हैं।

याचिका में कहा गया कि उस पर केवल छह लाख रुपये की कर चोरी का आरोप है। जांच के दौरान अनुसंधान एजेंसी के पास याचिकाकर्ता को पकड़ने के लिए पर्याप्त अवसर था, लेकिन इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया गया। वहीं निचली अदालत ने गत 11 मार्च को उसके खिलाफ प्रसंज्ञान ले लिया और याचिकाकर्ता की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए तुरंत गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए। ऐसे में मामले में जारी गिरफ्तारी वारंट को जमानती वारंट में बदला जाए। जिसका विरोध करते हुए सरकारी वकील अमित गुप्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता पर 10.65 करोड रुपये के फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट का आरोप है। ऐसे में उसके खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट को जमानती वारंट में नहीं बदला जाए।