ऑक्सफोर्ड यूनियन से गूगल बॉय कौटिल्य पंडित का वीडियो वायरल:पाकिस्तान की सैन्य नीति, कश्मीर और लोकतंत्र पर डिबेट में तथ्यों के साथ रखा भारत का पक्ष, दो मिनट में पाकिस्तान को दिखाया आईना

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ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे करनाल जिले के गांव कोहंड निवासी और गूगल बॉय के नाम से पहचाने जाने वाले कौटिल्य पंडित का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह वीडियो ऑक्सफोर्ड यूनियन में आयोजित एक अहम अंतरराष्ट्रीय डिबेट का है, जिसमें कौटिल्य ने फ्लोर स्पीकर के तौर पर हिस्सा लिया। डिबेट भारत और पाकिस्तान की मिलिट्री पॉलिसी को लेकर थी, जहां सीमित समय मिलने के बावजूद कौटिल्य ने तथ्यों, इतिहास और तर्कों के साथ भारत का पक्ष मजबूती से रखा। उनके वक्तव्य को सोशल मीडिया पर व्यापक सराहना मिल रही है। ऑक्सफोर्ड यूनियन की बहस में रखा गया भारत-पाक मिलिट्री पॉलिसी का मुद्दा
करीब तीन सप्ताह पहले माइकल मास टर्म के सप्ताह के दौरान ऑक्सफोर्ड यूनियन ने भारत और पाकिस्तान की सैन्य नीतियों पर एक डिबेट आयोजित की। इस डिबेट का शीर्षक था- “द हाउस बिलीव्स दैट इंडियाज रिस्पॉन्स टू पाकिस्तान इज अ पॉपुलिस्ट स्ट्रेटेजी सोल्ड ऐज सिक्योरिटी पॉलिसी।” इस विषय पर यूनियन में विभिन्न वक्ताओं ने अपनी-अपनी राय रखी। इसी दौरान कौटिल्य पंडित ने फ्लोर स्पीकर के रूप में अपनी बात रखने का अवसर मिला। कश्मीर की जनसांख्यिकी पर लगाए गए आरोपों को तथ्यों से किया खारिज
डिबेट के दौरान कौटिल्य ने सबसे पहले कश्मीर की जनसांख्यिकी को लेकर दिए गए बयानों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कुछ वक्ताओं के कथनों में तथ्यात्मक भ्रम है, जिन्हें स्पष्ट किया जाना जरूरी है। कौटिल्य ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि कश्मीर की जनसंख्या लगभग 96.41 प्रतिशत मुस्लिम, 2.45 प्रतिशत हिंदू और 0.81 प्रतिशत सिख है। जब लगभग 97 प्रतिशत आबादी एक ही समुदाय से संबंधित है, तो यह कहना कि वर्तमान समय में वहां की जनसांख्यिकी बदली जा रही है, पूरी तरह भ्रामक है। कश्मीरी पंडितों का पलायन बताया सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय परिवर्तन
कौटिल्य ने ऐतिहासिक संदर्भ रखते हुए कहा कि यदि वास्तव में कश्मीर में किसी बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव की बात की जाए, तो वह कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन के दौरान हुआ था। उन्होंने इसे इस क्षेत्र के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासद घटनाओं में से एक बताया। इस पलायन ने कश्मीर की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि उस पीड़ा की गूंज आज भी वितस्ता यानी झेलम और चंद्रभागा यानी चिनाब नदियों से जुड़ी स्मृतियों में महसूस की जा सकती है। राजतरंगिणी का उल्लेख कर कश्मीर की बहुलतावादी संस्कृति की बात
कौटिल्य ने कश्मीर की प्राचीन और बहुलतावादी संस्कृति का उल्लेख करते हुए कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों पुरानी यह संस्कृति एक ही रात में तहस-नहस कर दी गई। यह विनाश किसी स्वाभाविक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि कट्टरपंथी विचारधारा का परिणाम था, जिसे सीमा पार बैठे तत्वों से वित्तीय और वैचारिक समर्थन मिला। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की अनदेखी कर दिए गए बयान अधूरे और गलत साबित होते हैं। आर्थिक नुकसान और ऐतिहासिक जिम्मेदारी पर दो टूक जवाब
डिबेट में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान के कारण भारत को 126 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कौटिल्य ने कहा कि आर्थिक नुकसान से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके साथ एक मूल सत्य को भी समझना होगा। उन्होंने कहा कि जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। कर्मों के परिणाम होते हैं और ऐतिहासिक जिम्मेदारी को चुनिंदा नजरिए से नहीं देखा जा सकता। लोकतंत्र और भारत-पाक तुलना पर उठाए सवाल
कौटिल्य ने भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लेकर उठाई गई चिंताओं पर भी बात रखी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति द्वारा लोकतंत्र पर चिंता जताना लोकतांत्रिक व्यवस्था का ही हिस्सा है और यह पूरी तरह ठीक है। लेकिन जब “मोदी का भारत” कहकर उसकी तुलना पाकिस्तान से की जाती है, तो इतिहास को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री जैसे प्रधानमंत्रियों ने भी कठिन और सख्त निर्णय लिए थे। 1971 का जिक्र कर पाकिस्तान की सैन्य ताकत पर सवाल
पाकिस्तान की सैन्य शक्ति पर बोलते हुए कौटिल्य ने इसरार खान काकरजी का नाम लेते हुए 1971 की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि शायद यह भूल गए हैं कि 1971 में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था। उन्होंने दोहराया कि 93,000 कोई छोटी संख्या नहीं है। यही उस समय पाकिस्तान की तथाकथित सैन्य ताकत थी। सेना-केंद्रित नीति और फौजी फाउंडेशन का उदाहरण
कौटिल्य ने कहा कि पाकिस्तान शायद दुनिया का इकलौता देश है, जहां जनरल युद्ध हारते हैं और फिर भी ज्यादा तमगे पाते हैं। इसका कारण यह है कि पाकिस्तान की भारत नीति पूरी तरह सेना-केंद्रित है। वहां सत्ता और अस्तित्व इस भ्रम पर टिका है कि देश हमेशा युद्ध की स्थिति में है। इसी सोच ने कुछ लोगों को बेहद अमीर बना दिया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि फौजी फाउंडेशन लगभग 6 अरब डॉलर की संपत्तियों का मालिक है। लोकतंत्र की बजाय सामंती और भाई-भतीजावाद पर चोट
कौटिल्य ने पाकिस्तान की सत्ता संरचना को सामंती, भाई-भतीजावादी और सत्ता-लोलुप बताया। उन्होंने कहा कि वहां के शासक वर्ग को इस बात की परवाह नहीं है कि वास्तविक लोकतंत्र क्या कर सकता है। अगर सच में परवाह होती, तो फैज अहमद फैज और हबीब जालिब जैसे शायरों और विचारकों की बातों को याद किया जाता, न कि सेना की चापलूसी की जाती। सैन्य तानाशाही और नैतिक विरोधाभास पर टिप्पणी
अपने वक्तव्य के अंत में कौटिल्य ने एक महिला का जिक्र करते हुए कहा कि जिसके पिता की निर्मम हत्या सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक के दौर में हुई थी, आज उसी महिला का बेटा, जो ऑक्सफोर्ड यूनियन तक पहुंचा, उसी सेना के साथ खुला समझौता किए हुए है। उन्होंने कहा कि यह न तो किसी आदर्शवाद का उदाहरण है और न ही लोकतंत्र का। दो मिनट में रखी प्रभावशाली बात, सोशल मीडिया पर सराहना
कौटिल्य को डिबेट में केवल दो मिनट का समय मिला था, लेकिन इतने कम समय में भी उन्होंने भारत का पक्ष मजबूती से रखा। डिबेट के बाद कौटिल्य ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट साझा की, जिसमें उन्होंने लिखा कि पक्षपात से लिप्त वातावरण में डटकर मातृभूमि का थोड़ा सा ऋण उतारने की कोशिश की। इस पोस्ट पर सैकड़ों कमेंट आए और हर तरफ उनकी सराहना हो रही है। डिबेट का प्रस्ताव ही था पक्षपातपूर्ण
कौटिल्य के पिता सतीश शर्मा के अनुसार, कौटिल्य ने डिबेट से जुड़ी जानकारी साझा करते हुए बताया कि शुरुआत में ही यह स्पष्ट हो गया था कि डिबेट का प्रस्ताव अपने आप में पक्षपात लिए हुए था। उन्होंने बताया कि डिबेट के शीर्षक की भाषा ही यह संकेत दे रही थी कि बहस किस दिशा में झुक सकती है। ऑक्सफोर्ड यूनियन अध्यक्ष की पृष्ठभूमि पर भी उठे सवाल
सतीश शर्मा के मुताबिक, कौटिल्य ने यह भी बताया कि ऑक्सफोर्ड यूनियन के वर्तमान अध्यक्ष पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री के बेटे हैं। कौटिल्य का कहना था कि किसी की निजी पृष्ठभूमि होना अपने आप में कोई समस्या नहीं है, लेकिन ऐसे पद पर बैठे व्यक्ति के कारण संस्थान की तटस्थता पर सवाल जरूर खड़े होते हैं।