उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी आंगन की रौनक रही एक पत्थर की ओखली अब आधुनिकता की भेंट चढ़ती जा रही है. वह ‘ठक-ठक’ की आवाज, जो कभी गांव के जागने और आपसी भाईचारे का प्रतीक हुआ करती थी, अब मिक्सी और ग्राइंडर के शोर में दब गई है. बुजुर्ग मुन्नी जोशी की यादों से जानिए, कैसे आंगन के पत्थर को काटकर बनाई गई यह ओखली सिर्फ मसाला कूटने का साधन नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति और एकता की पहचान थी.
पहाड़ों से गायब हुई पारंपरिक ओखली की ‘ठक-ठक’, मिक्सी के शोर में गुम हुई उत्तराखंड की अनमोल विरासत
