वहीं श्रम विभाग ने मजदूरों का रजिस्ट्रेशन कराने की प्रक्रिया शुरू की, जबकि कोरानाकाल से ही यह कारोबार फल-फूल रहा है। शुरूआत में एक दो बसें माह में एक दो खेप मजदूरों को केरल ले जाया करती थीं। लेकिन अब प्रत्येक माह के हर बुधवार को चार-चार बसों पर दर्जनों महिलाएं, किशोरी और पुरूषों को क्षमता से अधिक जानवरों की तरह लाद कर ले जाया जा रहा है।
इधर, मामले को लेकर श्रम विभाग और जिला प्रशासन इक्का-दुक्का कार्रवाई कर खानापूर्ति पल्ला झाड़ ले रहा है।
उल्लेखनीय है कि 35 सीटों वाले बसों में 50 से 60 मजदूरों को केरल ले जाया जा रहा है। रोजगार की तलाश में जा रहे प्रवासी मजदूरों का नियमित पंजीयन भी नहीं हो पा रही है।
कमीशनखोर कर रहे मजदूरों की तस्करी
मजदूरों की तस्करी का यह खेल कमीशनखोरी को लेकर चल रहा है। प्रत्येक मजदूर पर सफेदपोश बिचौलिया को 500 रूपये का कमीशन मिलता है। वहीं प्रत्येक मजदूरों से 3 हजार की राशि वसूली जाती है। जहां केरल पहुंचने पर पैसे लेकर ठेकेदारों को सौंप दिया जाता है। इसके बाद केरल सहित आस-पास के राज्य और जिलों में मजदूरों को मनमाने तरीके काम कराया जाता है और उचित पारिश्रमिक भी नहीं मिलता है जो बाद में प्रताड़ना का शिकार होने पर सोशल मीडिया एवं समाचार पत्रों की सुर्खिया बनी रहती है।
उल्लेखनीय है कि कोराना काल के बाद अब ये बड़े पैमाने पर कारोबार की तरह फैलता जा रहा है।
