इसी संकट के बीच अंबिकापुर के युवा किसान वितिष गुप्ता ने वह रास्ता खोजा, जिसने प्रदेश ही नहीं कई राज्यों के किसानों को नई उम्मीद दी। पढ़ाई के दौरान बेंगलुरु में बीटेक करने वाले वितिष ने कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर खेती का रास्ता चुना। दादा के वर्षों पुराने ‘किसानों को आत्मनिर्भर बनाने’ के संकल्प से प्रेरित होकर उन्होंने वर्ष 2022 में करजी फ़ार्म की नींव रखी और ग्राफ्टेड पौधों का उत्पादन शुरू किया।
वितिष ने 14 एकड़ में अत्याधुनिक पॉलीहाउस तैयार किया और वैज्ञानिक ग्राफ्टिंग तकनीक को अपनाया। इस तकनीक में रोग-रोधी जड़ों पर मनचाही सब्ज़ी किस्म के कलम जोड़े जाते हैं, जिससे नया पौधा मजबूत, टिकाऊ और मिट्टी के संक्रमणों से सुरक्षित बनता है। शुरुआती अनुभव ही किसानों के लिए चमत्कार जैसा था। लुंड्रा, बगीचा और कल्याणपुर जैसे क्षेत्र, जहां विल्ट की वजह से खेती लगभग खत्म हो चुकी थी, वहां वितिष के ग्राफ्टेड पौधों ने नई जान फूंक दी। किसानों की पैदावार दो से तीन गुना तक बढ़ी, खेतों में सूखे की जगह फिर से हरियाली लौट आई और वर्षों बाद किसान मुनाफे में आए।
धीरे-धीरे वितिष का मॉडल सरगुजा से निकलकर देशभर में फैल गया। आज वे अपने पॉलीहाउस से ओडिशा, झारखंड, बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड और कर्नाटक सहित 17 राज्यों में हजारों किसानों को गुणवत्तापूर्ण ग्राफ्टेड पौधे सप्लाई कर रहे हैं। खेती की सलाह, पौधों की देखभाल और समस्या समाधान भी वे खुद किसानों के खेतों में जाकर या व्हाट्सएप के माध्यम से तुरंत करते हैं।
ग्राफ्टिंग ने न सिर्फ किसानों को बचाया, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए बड़ी रोज़गार क्रांति भी बन गई। वितिष बताया है कि अब तक 400 से ज्यादा महिलाओं को काम दे चुके हैं, जो प्रतिदिन 400 रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। एक वर्ष में ही वे डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के पौधे बेच चुके हैं।
ग्राफ्टिंग की वैज्ञानिक प्रक्रिया : जड़ वाले पौधे और फल-वाली किस्म को जोड़कर एक नया, अधिक सहनशील पौधा बनाना—अब सरगुजा का सफलता मॉडल बन चुकी है। वितिष गुप्ता के प्रयासों ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक तकनीक और नवाचार से खेती न केवल बच सकती है, बल्कि करोड़ों का अवसर भी बन सकती है।
