सुनवाई के दौरान एएजी मनोज शर्मा ने कहा कि संबंधित बालिका गृह को राज्य सरकार साल 2022 तक अनुदान देती थी, लेकिन उसके बाद अनियमितताओं के चलते इसे बंद कर दिया। वहीं बालिका गृह के संचालक ने ही मिलीभगत कर छात्राओं से हाईकोर्ट जज को लेटर लिखवाया है। राज्य सरकार ने मौके पर जांच की है, लेकिन मौके पर किसी तरह की अव्यवस्था नहीं मिली। इसके अलावा वहां पर एक संविदाकर्मी भी रखा हुआ था, लेकिन फिलहाल उसे हटा दिया है। दूसरी ओर मामले में विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से रिपोर्ट पेश की गई। इस पर अदालत ने कहा कि दोनों रिपोर्ट अलग-अलग है। ऐसे में विभाग के निदेशक मामले में तथ्यात्मक रिपोर्ट दे।
मामले के अनुसार अलवर बालिका गृह में रहने वाली किशोरियों की ओर से गत दिनों हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश को शिकायती पत्र भेजा था। जिसमें कहा गया था कि सरकारी अधिकारियों की निष्क्रियता के चलते उन्हें अनुदान मिलने में गंभीर चुनौतियां हो रही हैं। इसके साथ ही अधिकारियों पर प्रताडऩा का भी आरोप लगाया गया था। पत्र पर कार्रवाई करते हुए हाईकोर्ट की एकलपीठ ने मामले में स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लिया था। इसके साथ ही अदालत ने वयस्क होने पर शेल्टर होम छोड़ने वाले वयस्कों के लिए कोई प्रावधान नहीं होने के बिंदु पर भी केन्द्र व राज्य सरकार से जवाब तलब किया था। इसके साथ ही एकलपीठ ने मामले को जनहित याचिका के तौर पर सुनवाई के लिए खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने को कहा था। हालांकि खंडपीठ ने गत सुनवाई को मामले को बालिका गृह तक ही सीमित करते हुए अन्य बिंदुओं को सुनवाई से अलग कर दिया था।
