राधा रानी के चरणों में अनुगत्य से ही संभव है श्रीकृष्ण भक्तिः चंचलापति दास

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भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाए जाने वाले इस पर्व पर राधा रानी एवं वृन्दावन चंद्र का महाभिषेक वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न हुआ। पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, बूरा), विभिन्न फलों के रस, जड़ी-बूटियों एवं पुष्पों से महाभिषेक की प्रक्रिया को संपन्न कराया गया। इस अवसर पर ठाकुरजी को नीले एवं श्वेत वर्ण के रेशमी परिधानों के साथ रजत कढ़ाई युक्त वस्त्रों से अलंकृत किया गया।

वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर के अध्यक्ष चंचलापति दास ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि श्रीमती राधा रानी का एक नाम ‘भव व्याधि विनाशिनी’ है। जो भक्त उनके चरणों में पूर्ण समर्पण करता है, उन्हें राधा रानी भवसागर से पार लगाकर श्रीकृष्ण भक्ति प्रदान करती हैं एवं अपने निज धाम में आश्रय देती हैं। उन्होंने आगे कहा कि जीव प्रकृति के तीनों गुणों के वश होकर जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है, किन्तु राधा रानी अपने आश्रित भक्तों की माता की भांति रक्षा एवं पोषण करती हैं तथा उन्हें भक्ति मार्ग पर अग्रसर करती हैं। इस पावन अवसर पर हमें राधा रानी से निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें अपने चरणों की सेवा का अवसर प्रदान करें। राधाष्टमी महोत्सव के दौरान हरिनाम संकीर्तन में भक्तों ने भावविभोर होकर सहभागिता की। मथुरा, आगरा, लखनऊ, जयपुर, दिल्ली, भरतपुर सहित विभिन्न नगरों से आए श्रद्धालुओं ने उत्सव में भाग लिया और दिव्य आध्यात्मिक आनंद का अनुभव किया।