ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. पवन सिंघल ने बताया कि भरतपुर जिले के भुसावर निवासी काजल (20 वर्ष) की गर्दन में बिना चीरा लगाए कान के पीछे से दूरबीन तकनीक द्वारा थायराइड ग्रंथि की गांठों को निकाला गया। उन्होंने बताया कि इस विधि में गर्दन पर कोई कट नहीं लगता। कान के पीछे बालों से छिपे हिस्से में एक छोटे छिद्र के माध्यम से एंडोस्कोपिक उपकरण डाले जाते हैं। इसके जरिए सर्जन थायराइड ग्रंथि तक सीधा पहुँचकर गांठों को निकाल सकते हैं।
डॉ. सिंघल के अनुसार, यह तकनीक पारंपरिक तरीकों से बेहतर है क्योंकि इसमें संक्रमण या जटिलताओं की संभावना नगण्य होती है। ऑपरेशन के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ है। उसे न दर्द है, न ही आवाज पर कोई असर पड़ा है। उन्होंने बताया कि रेट्रोऑरिक्यूलर एंडोस्कोपिक तकनीक पारंपरिक ओपन थाइरोइड सर्जरी की तुलना में अधिक सुरक्षित, सौंदर्यपूर्ण और रोगी के अनुकूल है।
इस सर्जरी को डॉ.परिधि सिसोदिया, डॉ.इशिता बंसल और डॉ.तान्या (ईएनटी विभाग) ने डॉ.सिंघल के साथ मिलकर ऑपरेशन में सहयोग दिया।
निश्चेतन विभाग की टीम में डॉ.सुनीता मीना और डॉ. महिपाल, जबकि नर्सिंग टीम में नेहा, दिलीप और तारा सिंह शामिल थे।
क्या है रेट्रोऑरिक्यूलर एंडोस्कोपिक सर्जरी
रेट्रोऑरिक्यूलर एंडोस्कोपिक सर्जरी एक आधुनिक और कम इनवेसिव सर्जिकल तकनीक है, जिसमें ऑपरेशन कान के पीछे से किया जाता है यानी चेहरे या गर्दन पर कोई चीरा या निशान नहीं पड़ता। यह तकनीक विशेष रूप से थायराइड, पैराथायराइड और सैलिवरी ग्लैंड जैसी सर्जरी में उपयोग होती है।
