राहुल गांधी का बयान लोकतंत्र में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी से उन्‍हें मुक्‍त करता है

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भारतीय लोकतंत्र को लेकर हाल ही में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का यह कहना कि “लोकतंत्र बचाना मेरा काम नहीं” पूरे राजनीतिक विमर्श में हलचल पैदा कर गया है। यह बयान केवल विपक्ष और सत्‍ता पक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहनेवाला नहीं है, यह आज आम नागरिकों के मन में भी गहरे सवाल छोड़ता है। लोकतंत्र केवल चुनाव लड़ने और सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं है, यह एक सतत जिम्मेदारी है, जिसमें सत्‍ता और विपक्ष दोनों बराबर भागीदार होते हैं। यदि विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा ही यह कह दे कि लोकतंत्र को बचाना उसका काम नहीं, तो यह न केवल उसकी भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाता है बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की गंभीरता पर भी संदेह पैदा करता है।

कहना होगा कि विपक्ष का काम केवल सरकार की आलोचना करना या विरोध प्रदर्शन करना भर नहीं है। इसके पीछे संवैधानिक जिम्मेदारी निहित है कि वह जनता की आवाज बने, लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सजग रहे और संसद में सरकार के फैसलों पर ठोस बहस करे। राहुल गांधी ने हालिया कर्नाटक विधानसभा चुनावों के संदर्भ में जब यह आरोप लगाया कि चुनाव आयोग में ‘भेदियों’ की भरमार है और लोकतंत्र खतरे में है, तब यह अपेक्षा की जाती थी कि वे इस मुद्दे को कानूनी और संवैधानिक रास्तों से उठाएँगे। किंतु न्‍यायालय या चुनाव आयोग का रुख न अपनाकर उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि लोकतंत्र बचाना उनका काम नहीं है और उनका काम केवल सरकार पर दबाव डालना है। क्‍या उनका यह दृष्टिकोण सही है? उन्‍हें न सही कांग्रेस पार्टी के अन्‍य नेताओं को भी नहीं लगता कि राहुल की ये सोच राजनीतिक दृष्टि से संकीर्ण होने के साथ ही संवैधानिक सजगता की कमी भी उजागर करती है?

भारतीय लोकतंत्र के आपातकाल के दौर को देखिए; इंदिरा गांधी की सत्ता के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और अन्य विपक्षी नेताओं ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए जो संघर्ष किया, उसने लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास को और गहरा किया। अटल बिहारी वाजपेयी, सुषमा स्‍वराज जब विपक्ष में थे, तब वे अपनी तेजतर्रार आलोचना और गंभीर बहसों के लिए जाने जाते थे। वे सत्‍ता से असहमति रखते हुए भी लोकतंत्र की गरिमा को कभी कम नहीं करते थे। लेकिन आज राहुल गांधी क्‍या कर रहे हैं। वास्‍तव में यही अपेक्षा नेता प्रतिपक्ष से है कि वे लोकतंत्र को न केवल भाषणों में बल्कि अपने आचरण से भी मजबूत करें।

राहुल गांधी की राजनीतिक शैली में अक्सर यह देखने को मिला है कि वे संसद से अधिक सड़क पर सक्रिय रहते हैं। वे बेरोजगारी, महंगाई, किसानों और युवाओं के मुद्दों को बार-बार उठाते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर वैकल्पिक दृष्टिकोण या ठोस नीति पेश करने से चूक जाते हैं। जबकि नेता प्रतिपक्ष का पद केवल आलोचना नहीं बल्कि विकल्प प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी भी मांगता है। इस पृष्ठभूमि में उनका यह कहना कि लोकतंत्र बचाना उनका काम नहीं, उनकी राजनीतिक गंभीरता को और कमजोर करता है।

क्‍या उन्‍हें ये भान नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र कोई स्वतः जीवित रहने वाली व्यवस्था नहीं है? यह निरंतर सजगता, संघर्ष और संस्थागत मजबूती से चलता है। न्यायपालिका, मीडिया और जनता के साथ-साथ विपक्ष इसका अभिन्न हिस्सा है। जब विपक्ष का सबसे बड़ा नेता यह जिम्मेदारी अपने कंधों से उतार देता है और उसे युवाओं या जनता पर डाल देता है, तो लोकतंत्र के प्रहरी की जगह खाली हो जाती है। राहुल गांधी ने अपने बयान में कहा कि देश के युवा और जनरेशन-जेड लोकतंत्र बचाएँगे। निस्संदेह युवा किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होते हैं, लेकिन क्या केवल युवाओं पर यह जिम्मेदारी डालकर नेता प्रतिपक्ष स्वयं को मुक्त कर सकते हैं? नेता का काम युवाओं को नेतृत्व देना है, उन्हें दिशा दिखाना है, न कि अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटकर उन्हें सत्‍ता से लड़ाने-भिड़ाने के लिए छोड़ देना!

उनके इस बयान के बाद यदि भारतीय जनता पार्टी और सत्‍ता पक्ष ये कहें कि कांग्रेस देश को अस्थिर करना चाहती है और भारत को नेपाल या बांग्लादेश जैसी स्थिति में ले जाना चाहती है तो वे क्‍या गलत कह रहे हैं? यह आरोप राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा भर नहीं हैं। आज आम जनता के मन में भी यह सवाल उठने लगा है कि यदि विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा ही लोकतंत्र की रक्षा को अपना काम नहीं मानता, तो फिर लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी किस पर है।

यह सच है कि लोकतंत्र में सत्‍ता का दायित्व है कि वह नीति बनाए और उसे लागू करे, किंतु इसके साथ विपक्ष का दायित्व भी यहां तक है, वह यह कि सरकार के कामकाज को परखे, गलतियों की ओर ध्यान दिलाए और जनता को सही जानकारी दे। यदि विपक्ष केवल आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति तक सीमित हो जाए और रचनात्मक भूमिका न निभाए, तो लोकतंत्र का संतुलन टूटता है। आज राहुल गांधी का हालिया बयान इसी टूटते हुए संतुलन की चिंता को और गहरा कर रहा है।

राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि विपक्ष का नेता होने के नाते उन्हें न केवल सरकार की आलोचना करनी है, बल्‍कि इससे कहीं अधिक देश के विकास से संबंध‍ित ठोस समाधान भी प्रस्तुत करना हैं। क्‍योंकि लोकतंत्र की रक्षा केवल राजनीतिक नारे तक ही नहीं है, वह संवैधानिक और नैतिक दायित्व है, जिसे टाला नहीं जा सकता। इसलिए लोकतंत्र को बचाना सभी नागरिकों का काम है, लेकिन उसे सही दिशा देना और जनता को यह विश्वास दिलाना कि उसकी आवाज सुनी जा रही है, यह काम सबसे पहले विपक्ष के नेता का ही होता है। राहुल गांधी का हालिया बयान इस जिम्मेदारी से भागने वाला नजर आ रहा है। अब यह उन्हीं पर है कि वे अपने आचरण और दृष्टिकोण से यह साबित करें कि वे न केवल एक आलोचक हैं बल्कि लोकतंत्र के संरक्षक भी हैं।