नाबालिग आत्महत्या मामला : जांच अधिकारी को निलंबित करने के आदेश, पीड़ित परिवार को मिलेगी सुरक्षा

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आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि इस प्रकरण में पुलिस की शुरुआती जांच बेहद लापरवाही भरी रही है, जिससे पूरा मामला प्रभावित हुआ। 20 सितंबर 2025 को जब एफआईआर दर्ज हुई, तब पुलिस ने इसे अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धाराओं के तहत दर्ज ही नहीं किया। यह कदम तभी उठाया गया जब मामला हाईकोर्ट के संज्ञान में आया। उन्होंने बताया कि शिकायत में पीड़ित परिवार ने स्पष्ट लिखा था कि बच्चे को ‘अछूत’ कहकर घर से बाहर निकाला गया और घर की शुद्धि के लिए बकरे की मांग की गई, लेकिन पुलिस ने इस गंभीर पक्ष को नजरअंदाज कर दिया।

आयोग ने कहा कि आरोपित महिला की अब तक गिरफ्तारी न होना भी जांच की कमियों को दर्शाता है। अध्यक्ष ने बताया कि 1 अक्टूबर को आयोग ने एसडीपीओ रोहड़ू से तीन दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन समयसीमा बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट नहीं दी गई। आयोग को 14 अक्टूबर को ही डीजीपी कार्यालय से यह रिपोर्ट प्राप्त हुई। इस देरी और लापरवाही पर आयोग ने कड़ा एतराज जताया और एसडीपीओ रोहड़ू से स्पष्टीकरण तलब करने का निर्णय लिया है।

आयोग ने मौके पर पहुंचकर जांच अधिकारियों से विस्तृत पूछताछ की और पीड़ित परिवार से भी मुलाकात की। बैठक में पीड़ित परिवार ने आयोग को पूरी घटना की जानकारी दी। आयोग ने बताया कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की ओर से पीड़ित परिवार को 4 लाख 12 हजार 500 रुपये की वित्तीय सहायता पहले ही प्रदान की जा चुकी है।

आयोग अध्यक्ष कुलदीप कुमार धीमान ने कहा कि अनुसूचित जाति आयोग का मुख्य उद्देश्य दलित एवं पिछड़े वर्ग के लोगों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें न्याय दिलवाना है। उन्होंने कहा कि यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है, इसलिए आयोग निष्पक्ष और तीव्र जांच सुनिश्चित करने के लिए लगातार निगरानी कर रहा है।

धीमान ने यह भी बताया कि मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू स्वयं इस मामले पर नजर रखे हुए हैं और उन्होंने ही निर्देश दिए थे कि आयोग पीड़ित परिवार से मुलाकात कर उनकी हर संभव सहायता सुनिश्चित करे।