क्लाइमेट चेंज का असर:भोज वेटलैंड में प्रवासी पक्षियों का माइग्रेशन 50–60% पर अटका

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जलवायु परिवर्तन का असर अब भोपाल के मौसम के साथ-साथ यहां की जैव विविधता पर भी साफ नजर आने लगा है। कभी अचानक ठंड, तो कभी तापमान में तेजी से बढ़ोतरी- इस अस्थिर मौसम का सीधा प्रभाव बड़ा तालाब, छोटा तालाब, कलियासोत डैम और करवा डैम जैसे जलस्रोतों पर पड़ रहा है। नतीजतन इस सर्दी प्रवासी पक्षियों का माइग्रेशन उम्मीद से काफी कम दर्ज किया गया है। बर्ड एक्सपर्ट मोहम्मद खालिक के अनुसार इस साल माइग्रेशन पिछले साल की तरह ही करीब 50 से 60 प्रतिशत पर अटका हुआ है। जबकि सामान्य परिस्थितियों में और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर यह आंकड़ा कहीं ज्यादा होना चाहिए था। उनका कहना है कि माइग्रेशन में न बढ़ोतरी हो रही है और न ही बड़ी गिरावट स्थिति फिलहाल स्थिर बनी हुई है। मौसम के फ्लक्चुएशन ने बिगाड़ा माइग्रेशन पैटर्न
खालिक के मुताबिक भोपाल में इस बार ठंड का पैटर्न स्थिर नहीं रहा। दो-तीन दिन गर्मी, फिर अचानक ठंड—इस तरह के बदलाव से पक्षियों का माइग्रेशन डिस्टर्ब होता है। अपेक्षाकृत ज्यादा ठंडे इलाकों में ही कई प्रवासी पक्षी रुक जा रहे हैं और कम ठंडी जगहों की ओर आने से बच रहे हैं। यही वजह है कि मध्य भारत में माइग्रेशन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा। वाटर लेवल ज्यादा, डक प्रजातियों को परेशानी
भोपाल की प्रमुख वाटरबॉडी में इस बार पानी का स्तर सामान्य से काफी ज्यादा है। अच्छी बारिश, पानी का पूरी तरह ड्रेन न होना और बाहरी स्रोतों से पानी आने के कारण जलस्तर अब तक कम नहीं हुआ है। इसका सबसे ज्यादा असर डक प्रजातियों पर पड़ा है। डक माइग्रेशन में बड़ी संख्या में आती हैं और ये गोता लगाकर पानी के अंदर से भोजन खोजती हैं। पानी ज्यादा होने से उनका फूड नीचे चला जाता है, जिससे उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता।
ज्यादा जलस्तर बना डक प्रजातियों के लिए चुनौती
इस साल अच्छी बारिश और जल निकासी पूरी तरह न होने के कारण भोपाल की वाटरबॉडी में पानी का स्तर सामान्य से ज्यादा बना हुआ है। इसका सबसे ज्यादा असर डक प्रजातियों पर पड़ा है।
डक गोता लगाकर पानी के अंदर से भोजन तलाशती हैं, लेकिन गहराई ज्यादा होने से उनका फूड नीचे चला जाता है। इससे उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा और कुछ जगहों पर यह स्थिति उनके लिए जोखिम भी बन रही है। शहर में हुई बर्ड काउंटिंग
शनिवार को भोज वेटलैंड विंटर बर्ड काउंट 2025–26 का आयोजन किया गया। कार्यक्रम भोपाल बर्ड्स संस्था, मध्य प्रदेश राज्य वेटलैंड प्राधिकरण (एप्को), भोपाल वनमंडल और व्हीएनएस नेचर सेवियर्स के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। सुबह 6 बजे से 80 प्रतिभागियों ने भोज ताल के तीन चयनित जोन बिशनखेड़ी, बम्होरी और बीलखेड़ा में पक्षी गणना की। 110 प्रजातियां चिन्हित, लेकिन संख्या कम
गणना के दौरान लगभग 110 पक्षी प्रजातियों की पहचान की गई। इनमें रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, कॉमन पोचार्ड, कॉमन कूट, ब्रह्मिनी शेल्डक, ब्लू थ्रोट, पेंटेड स्टोर्क, पर्पल हेरॉन, लार्ज कोर्मोरेंट, स्टेपी ईगल, ब्लैक रेडस्टार्ट, रेड ब्रेस्टेड फ्लाईकैचर और यूरेशियन राइनेक जैसी प्रमुख प्रवासी प्रजातियां शामिल रहीं। इसमे रेड क्रेस्टेड पोचार्ड अब आना शरू हुए हैं और ठीक संख्या में दिख रहे हैं। जोनवार प्रजातियों की संख्या बिशनखेड़ी में 64, बम्होरी में 55 और बीलखेड़ा में 45 दर्ज की गई। फरवरी के अंत तक उम्मीद बरकरार विशेषज्ञों के मुताबिक अभी आंकड़े अंतिम नहीं हैं। कई डक प्रजातियां फरवरी के आखिरी सप्ताह तक भी आती हैं। अगर आने वाले दिनों में जलस्तर कुछ कम होता है, तो प्रवासी पक्षियों की संख्या में इजाफा संभव है। कार्यक्रम के समापन अवसर पर एप्को के वैज्ञानिक लोकेंद्र ठक्कर मुख्य अतिथि और व्हीएनएस नेचर सेवियर्स के प्रमुख डी.के. स्वामी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। आयोजन ने एक बार फिर संकेत दिया कि जलवायु परिवर्तन के दौर में वेटलैंड संरक्षण और वैज्ञानिक मॉनिटरिंग पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है। यह भी दिखे…