यूपी में 2027 का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए सभी राजनीतिक दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। लेकिन, इस रेस में बसपा ने चार प्रत्याशी घोषित कर बाजी मार ली है। बसपा ने दो मुस्लिम और दो ब्राह्मण चेहरों पर दांव लगाकर ये बता दिया है कि 2027 के लिए मुस्लिम-ब्राह्मण समीकरण उसके कोर एजेंडे में होगा। बसपा 2022 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 1 सीट जीत पाई थी। 18 सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। पार्टी पहले चरण में 18 सीटों पर प्रत्याशी/विधानसभा प्रभारी घोषित करेगी। बसपा इस बार जून तक प्रदेश की अधिकांश सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर देगी। बसपा की रणनीति मार्च 2026 तक 100 से अधिक सीटों पर प्रत्याशी/विधानसभा प्रभारी घोषित करने की है। बसपा की इस रणनीति का कितना असर होगा? ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण कितना असर डालेगा? पढ़िए ये रिपोर्ट… बसपा ने अब तक ये 4 प्रत्याशी घोषित किए अबुल कैस आजमी: फूलपुर पवई से दो चुनाव हारे, अब सीट बदली अबुल कैस आजमी, आजमगढ़ में दीदारगंज के सरायमीर के रहने वाले हैं। वे बसपा से लंबे समय से जुड़े हैं। 2012 और 2017 में फूलपुर पवई से दो बार बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। पहली बार 46 हजार और दूसरी बार 61 हजार वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे। दोनों बार करीबी अंतर से हार गए थे। 2022 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। अब 2027 में सीट बदलकर दीदारगंज से चुनाव लड़ेंगे। इस सीट पर मुस्लिम-दलित विनिंग कॉम्बिनेशन
दीदारगंज विधानसभा सीट पर 95 हजार मुस्लिम और लगभग 80 हजार दलित वोटर हैं। वहीं, ओबीसी में 38 हजार राजभर, 14 हजार चौहान और 7 हजार निषाद समाज के लोग हैं। 2022 में सपा मुस्लिम-राजभर समीकरण से जीती थी। उसे 37 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं दूसरे नंबर पर रही भाजपा को 30 प्रतिशत और तीसरे नंबर पर रही बसपा को 23 प्रतिशत वोट मिले थे। फिरोज आफताब: छह महीने पहले सपा छोड़कर बसपा का दामन थामा सहारनपुर के सरसावा क्षेत्र के रहने वाले फिरोज आफताब का परिवार राजनीतिक रहा है। उनके दादा चौधरी जफर अहमद यूपी की पहली विधानसभा में कांग्रेस से विधायक चुने गए थे। फिर उनके चाचा शमशाद अहमद 1977 में जनता पार्टी से विधायक बने। उनके पिता आफताब अहमद सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट लेकर 1984 में सरसावा (वर्तमान में नकुड़) से दलित-मजदूर-किसान पार्टी से चुनाव लड़े थे। वह दूसरे नंबर पर रहे। 1996 में फिरोज आफताब ने सरसावा से निर्दलीय चुनाव लड़ा और उन्हें 40 हजार वोट मिले। वह दूसरे नंबर पर थे। सपा के प्रदेश अध्यक्ष रामशरण दास के बेटे सपा से चुनाव में उतरे थे। मुलायम सिंह ने प्रचार किया था। फिर भी उनकी जमानत जब्त हो गई थी। फिरोज ये चुनाव भाजपा से महज 90 वोटों से हार गए थे। 2001, 2007 में फिरोज आफताब लोकदल से चुनाव लड़ चुके हैं। इसके बाद सपा में शामिल हो गए थे। आखिरी बार 2012 का चुनाव उन्होंने सहारनपुर ग्रामीण से लड़ा था। 2014 में सपा ने उन्हें सहारनपुर से लोकसभा का प्रत्याशी बनाया था, लेकिन आखिरी में दूसरे का नाम घोषित कर दिया था। छह महीने पहले उन्होंने सपा छोड़कर बसपा की सदस्यता ली थी। दलित-मुस्लिम समीकरण के भरोसे आफताब
इस सीट पर अभी सपा के आशु मलिक विधायक हैं। इस सीट पर लगभग 1.25 लाख मुस्लिम वोटर हैं। 90 हजार दलित मतदाता हैं। 32 हजार सैनी, 18 हजार गुर्जर और सवर्णों में 24 हजार ब्राह्मण-ठाकुर वोटर हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा प्रत्याशी आशु मलिक को 1.07 लाख, भाजपा के जगपाल सिंह को 76 हजार और बसपा के अजब सिंह चौधरी को 62 हजार वोट मिले थे। विनोद मिश्रा: 14 साल से राजनीति में सक्रिय, पहली बार लड़ेंगे चुनाव विनोद मिश्रा मूल रूप से जौनपुर के मुंगरा बादशाहपुर विधानसभा क्षेत्र के सोहासा गांव के रहने वाले हैं। पिछले 14 सालों से राजनीति में सक्रिय हैं। विनोद ने भाजपा से राजनीति की शुरुआत की। इसके बाद वे सपा में शामिल हो गए थे। 2022 तक सपा में रहे। छह महीने पहले उन्होंने बसपा की सदस्यता ली। परिवार में कभी कोई राजनीति में नहीं रहा। वे खुद पहली बार कोई चुनाव लड़ेंगे। ब्राह्मण-दलित समीकरण यहां जीत की गारंटी
मुंगरा बादशाहपुर विधानसभा ब्राह्मण बहुल सीट है। यहां सबसे अधिक लगभग 80 हजार ब्राह्मण वोटर हैं। इसके बाद 70 हजार दलित वोटर हैं। जबकि ओबीसी में 60 हजार पटेल और 40 हजार यादव वोटर हैं। 30 हजार मुस्लिम वोटर भी हैं। अभी इस सीट से सपा के पंकज पटेल विधायक हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के पंकज को 92 हजार, भाजपा के अजय शंकर दुबे को 86 हजार और बसपा के दिनेश कुमार शुक्ला को 32 हजार वोट मिले थे। आशीष पांडेय: तीसरी बार के प्रयास में मिला टिकट आशीष पांडेय मूल रूप से जालौन के माधौगढ़ विधानसभा क्षेत्र के कुरौती गांव के रहने वाले हैं। वे 14 सालों से बसपा से जुड़े हैं। उनका भांजा बसपा से जिला पंचायत सदस्य है। आशीष का रियल एस्टेट का बड़ा काम है। ग्वालियर में भी उनका कारोबार है। उन्होंने 2017 और फिर 2022 में इस सीट से दावेदारी जताई थी, लेकिन टिकट नहीं मिला। तीसरी बार के प्रयास में इस बार उन्हें बसपा ने अपना प्रत्याशी बनाया है। परिवार के वे पहले सदस्य हैं, जो राजनीति में सक्रिय हैं। बुंदेलखंड प्रभारी लालाराम के साथ उन्होंने बसपा प्रमुख मायावती से मुलाकात की, इसके बाद उनका नाम घोषित किया गया। दलित वोटर निर्णायक, ब्राह्मण दूसरे नंबर पर
माधौगढ़ विधानसभा सीट पर सबसे अधिक दलित वोटर हैं। यहां लगभग 90 हजार दलित वोटर हैं। दूसरे नंबर पर ब्राह्मण वोटर हैं। इनकी संख्या लगभग 44 हजार है। वहीं लगभग 40 हजार राजपूत और 20 हजार मुस्लिम वोटर हैं। कुशवाहा सहित ओबीसी वोटर भी लगभग 1.50 लाख हैं। अभी यहां भाजपा के मूलचंद्र निरंजन विधायक हैं। ये कुर्मी समाज से आते हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 41 प्रतिशत, बसपा को 27 प्रतिशत और सपा को 24 प्रतिशत वोट मिले थे। 2027 को लेकर बसपा का ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण पर जोर बसपा ने अभी तक 4 सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए हैं। इसमें पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिम यूपी शामिल है। अभी तक 4 प्रत्याशियों में दो मुस्लिम और दो ब्राह्मण हैं। मुस्लिम जहां सपा के कोर वोटर माने जाते रहे हैं। वहीं, ब्राह्मण अब तक भाजपा के कोर वोटर के तौर पर गिने जाते हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में मायावती दोनों पार्टियों के इन कोर वोटरों को तोड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। इसका संकेत मायावती ने 15 जनवरी को अपने जन्मदिन और 7 फरवरी को यूपी-उत्तराखंड के पदाधिकारियों की बैठक में दे चुकी है। मायावती ने दोनों बार खुलकर ब्राह्मणों को पार्टी से जुड़ने की अपील की। ये भी कहा कि उनकी सरकार में सबसे अधिक ब्राह्मणों को सम्मान मिला। इसी तरह दलित-मुस्लिम भाईचारा कमेटी की बैठक में मायावती ने खुलकर मुस्लिमों को पार्टी से जुड़ने की अपील की थी। उन्होंने भरोसा दिया है कि मुस्लिम समाज साथ दे तो वे 2027 में भाजपा को हरा देंगी। मायावती ने मुस्लिमों को गणित के फॉर्मूले की तरह समझाया भी कि सपा के कोर वोटर यादव सिर्फ 8-9 प्रतिशत हैं। 19 प्रतिशत मुस्लिमों का साथ पाकर भी वे 27 प्रतिशत तक ही पहुंच सकते हैं। जबकि यूपी में दलित आबादी 20 प्रतिशत है। मुस्लिम साथ दें तो ये आंकड़ा 39 प्रतिशत पहुंचता है, जो किसी भी विधानसभा में जीत के लिए बड़ा आंकड़ा बनता है। यदि इसमें 9-11 प्रतिशत आबादी वाले ब्राह्मणों का भी समर्थन जुड़ जाए तो आंकड़ा 50 प्रतिशत तक पहुंचता है। बसपा मार्च तक 100 से अधिक सीटों का कर देगी ऐलान
बसपा से जुड़े पूर्वांचल के एक कोऑर्डिनेटर कहते हैं कि मेरे प्रभार वाले मंडलों में विधानसभा की 21 से 22 सीटें हैं। मार्च तक मेरे सभी विधानसभा क्षेत्रों के प्रत्याशी तय हो जाएंगे। उनके नामों की घोषणा भी हो जाएगी। बसपा ने 2022 के विधानसभा चुनाव में 18 सीटों पर दूसरे नंबर पर थी। इन सीटों पर भी मार्च तक बसपा प्रत्याशी घोषित कर देगी। इन सीटों में अनूपशहर, रामपुर मनिहारन, बरौली, खैर, हाथरस, मांट, गोवर्धन, एत्मादपुर, आगरा उत्तर, आगरा ग्रामीण, सहसवान, संडीला, ललितपुर, मेहरौनी, जलालपुर, मड़िहान, पिंडरा विधानसभा शामिल हैं। माधौगढ़ से बसपा प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। सपा से टूटकर मुस्लिम बसपा से जुड़ रहे
बसपा ने मुस्लिमों को पार्टी से जोड़ने की कवायद तेज कर दी है। यही कारण है कि उसने पश्चिम का प्रभार देख रहे मुनकाद अली को चार बड़े मंडलों का कोऑर्डिनेटर बनाकर उनके कद को बढ़ाया है। पश्चिम में सहारनपुर देहात सीट पर सपा के आफताब आलम को तोड़कर पार्टी में शामिल किया और प्रत्याशी भी बनाया। इसी तरह बाराबंकी के तालिब नजीब, सपा के प्रदेश सचिव हफीज भारती ने बसपा का दामन थामा है। पार्टी का दावा है कि जल्द ही कई और बड़े मुस्लिम चेहरे बसपा के हाथी पर सवार दिखेंगे। मायावती ने पार्टी के चार बड़े नेताओं की तय की जिम्मेदारी
मायावती ने इसी महीने 7 फरवरी को यूपी-उत्तराखंड के पदाधिकारियों की बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। इसमें ब्राह्मण, ओबीसी, राजपूत के साथ अपने कोर वोटर दलितों को साधने की जिम्मेदारी पार्टी के चार बड़े नेताओं को सौंपी है। मायावती ने ब्राह्मणों को साधने के लिए महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को, राजपूतों को साधने के लिए उमाशंकर सिंह को, अति पिछड़ों को साधने के लिए प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल और दलितों को साधने के लिए भतीजे आकाश आनंद को जिम्मेदारी सौंपी है। पार्टी के सोर्स कहते हैं कि जल्द ही ब्राह्मण बहुल जिलों में सतीश चंद्र मिश्रा, पिछड़ा और अति पिछड़ा बहुल क्षेत्रों में विश्वनाथ पाल, क्षत्रिय बहुल्य जिलों में उमाशंकर सिंह दौरे करेंगे। आकाश आनंद प्रदेश के सभी जिलों में जाकर कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें करेंगे। ——————— ये खबर भी पढ़ें- अखिलेश का कितना खेल खराब करेंगे ओवैसी:बसपा से हाथ मिलाया तो सपा मुश्किल में; पिछले विधानसभा चुनाव में 7 सीटें गंवाई थीं हाल में बिहार और महाराष्ट्र में चुनावी सफलता के बाद ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने यूपी में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी समेत स्थानीय नेता खुलकर सपा को चुनौती दे रहे हैं। ओवैसी ने तो यहां तक कह दिया है कि वे अखिलेश यादव की दुकान बंद कर देंगे। पढ़ें पूरी खबर…
मायावती अगले एक महीने 100 विधानसभा प्रत्याशी उतारेंगी:ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण पर दांव; टिकट देने की रेस में आगे निकलीं
