मनरेगा में मजदूरों को नहीं मिल रहा सौ दिन का काम, सभी जबकार्ड धारकों को मिले काम:भूपेंद्र

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बैठक में मज़दूरों को मनरेगा में सौ दिनों का रोज़गार न मिलने पर चिंता व्यक्त की गई और अब ग्रामीण विभाग के एक पत्र के बहाने उन मज़दूरों जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं। उन्हें पिछले तीन महीने से काम नहीं दिया जा रहा है, जिनके पति नौकरी या पेंशन लेते हैं । जबकि मनरेगा कानून के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

भूपेंद्र सिंह ने कहा कि मनरेगा क़ानून में ये दिशा निर्देश दिए गए हैं कि जिन मज़दूरों के लिए आय का कोई दूसरा साधन नहीं है उन्हें प्राथमिकता दी जाए और वे सौ दिन के काम करने से वंचित न रहें लेक़िन दूसरे जॉबकार्ड धारकों को इससे वंचित करने के कोई आदेश नहीं हैं ,लेकिन मौखिक रूप में ग्राम पंचायतों में पंचायत कर्मचारियों ने उन्हें वंचित कर दिया है। जिसका यूनियन विरोध कर रही है और मनमर्ज़ी के इस फ़ैसले के खिलाफ़ अब यूनियन जनजागरण अभियान चलाएगी और खंड स्तर पर इसके खिलाफ़ धरना प्रदर्शन भी करेगी। इसके अलावा यूनियन मनरेगा मज़दूरों को हिमाचल सरकार का न्यून्तम दिहाड़ी 425 रुपए देने की भी मांग उठाएगी तथा मनरेगा में घरों की सुरक्षा के लिए जो डंगे लगाने का प्रावधान रखा गया था, उसे अब अचानक समाप्त कर दिया गया है। जिससे मज़दूरों को सौ दिनों का काम मिलना और मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा ये भी निर्णय लिया गया कि राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड हमीरपुर में मंडी ज़िला के 35 हज़ार मनरेगा, ग्रामीण निर्माण मज़दूरों और फोरलेन में काम करने वाले मजदूरों की एक करोड़ रुपए से ज्यादा की सहायता राशि पिछले चार साल से रोकी हुई है।

भूपेंद्र सिंह ने कहा कि बोर्ड वर्ष 2029-21 में जमा मज़दूरों के आवेदन फार्मों को आजकल वापिस लौटाया जा रहा है और उनसे उस समय की इकेवाईसी और रोज़गार प्रमाण पत्र दोबारा मांगे जा रहे हैं। ये सब मज़दूरों को मिलने वाली सहायता से वंचित करने की रणनीति के तहत ही है।इसके अलावा इकेवाईसी करने की शर्त तो ज़रूर लगाई गई है लेकिन अभी तक कुल दस प्रतिशत की ही हुई है और इस रफ्तार से तो इसे पूरा करने के लिए सालों लग जाएंगे। क्लेमों कि वेरिफिकेशन के नाम पर समय और बोर्ड के पैसे की बर्बादी की जा रही है।