आईआईटी मंडी के सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डिजास्टर मैनेजमेंट (सी3डीएआर) के अंतर्गत यह परियोजना लागू की जाएगी। इसका मुख्य उद्देश्य उन्नत अनुसंधान सुविधाओं का निर्माण करना, स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए सतत प्रौद्योगिकी समाधानों का विकास करना है।
आईआईटी मंडी के निदेशक प्रो. लक्ष्मिधर बेहेरा ने कहा कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में हाल ही में भूस्खलन और बाढ़ से हुई तबाही ने लचीले तंत्र की आवश्यकता को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया कि टाटा ट्रस्ट्स के सहयोग से संस्थान अत्याधुनिक अनुसंधान को बढ़ावा देगा, सामुदायिक लचीलापन को मजबूत करेगा और ऐसे नवाचारी समाधान विकसित करेगा जो लोगों के जीवन और आजीविका की सुरक्षा करेंगे।
आईआईटी मंडी के डीन प्रो. वरुण दत्त ने कहा कि यह अनुदान भूस्खलन जोखिम में कमी और हिमालयी समुदायों में लचीलापन बढ़ाने के लिए प्रभावशाली समाधान विकसित करने में मदद करेगा। उन्होंने बताया कि परियोजना में वैज्ञानिक नवाचार और स्थानीय सहभागिता को जोड़कर सुरक्षित और टिकाऊ पर्वतीय समुदायों का निर्माण किया जाएगा।
सी3डीएआर की चेयरपर्सन डॉ. कला वी. उदय ने कहा कि इस पहल के तहत प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का विस्तार, भूकंप तैयारी को सुदृढ़ करना और सामुदायिक एवं प्रकृति-आधारित समाधानों का एकीकरण किया जाएगा। इससे हिमालयी क्षेत्र के अलावा देश के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों के लिए भी मॉडल तैयार होंगे।
टाटा ट्रस्ट्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री सिद्धार्थ शर्मा ने कहा कि मंडी में हाल की तबाही ने क्षेत्रीय जोखिम और स्थानीय लचीलापन की परीक्षा दिखाई है। उन्होंने बताया कि इस पहल का उद्देश्य विज्ञान, सामुदायिक अंतर्दृष्टि और संस्थागत क्षमता को जोड़कर ऐसे व्यावहारिक समाधान तैयार करना है जो सबसे अधिक प्रभावित लोगों की रक्षा करेंगे।
आईआईटी मंडी ने इस ऐतिहासिक सहयोग के लिए डीओआरए कार्यालय और सी3डीएआर की टीम के प्रयासों की सराहना की।
