पिघलने लगी अमेरिका-भारत तनाव की बर्फ : अमेरिकी दूतावास का एक ट्वीट जो दे रहा खास संदेश

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दरअसल, पिछले कुछ समय से भारत और अमेरिका के रिश्तों में तल्खी बढ़ी है। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया, जिससे व्यापारिक तनाव बढ़ा। रूस से सस्ता तेल आयात करने पर अमेरिका ने दिल्ली पर दबाव बनाया। बार-बार ट्रंप ने भारत-पाक युद्धविराम का श्रेय खुद लेने की कोशिश की और इसे चुनावी मुद्दा बनाया। मीडिया में खबरें आईं कि प्रधानमंत्री मोदी कई बार ट्रंप के फोन कॉल रिसीव नहीं कर पाए। इन घटनाओं ने माहौल को ठंडा कर दिया। रिश्ते जो कभी नई ऊँचाइयों की तरफ बढ़ रहे थे, अचानक तनाव और अविश्वास की बर्फ में जम गए।

एससीओ और अमेरिका की रणनीति?

शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन का मंच अमेरिका का हिस्सा नहीं है। यह वही समूह है, जिसमें चीन और रूस जैसे देश बड़ी भूमिका निभाते हैं। भारत का इस मंच पर सक्रिय होना और मोदी का सात साल बाद चीन जाना, दोनों बातें अमेरिका के लिए असहज करने वाली हैं। रक्षा एवं कूटनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत, रूस और चीन के बीच नए समीकरण बनते हैं, तो एशिया में अमेरिका का प्रभाव कम हो जाएगा। यही वजह है कि दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास का ट्वीट तुरंत सामने आया, मानो वॉशिंगटन यह बताना चाहता हो कि भारत के लिए असली साझेदार अभी भी अमेरिका ही है।

भारत के संतुलित प्रयास

वैसे दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच खटपट नई नहीं है। यह रिश्ते हमेशा उतार-चढ़ाव से गुजरते रहे हैं। कभी रक्षा सहयोग की ऊँचाइयाँ, तो कभी व्यापारिक मतभेद की गहराइयाँ। लेकिन इस बार दोनाें देशों के बीच रिश्तों का दौर कुछ ज्यादा ठंडा हो गया था। ऐसे में अमेरिकी ट्वीट रिश्तों की बर्फ को पिघलाने का प्रयास लगता है। दूसरी ओर भारत का रुख अब भी पहले की तरह ही स्पष्ट है, वह किसी एक ध्रुव पर खड़ा नहीं होना चाहता। रूस के साथ पारंपरिक दोस्ती, चीन के साथ स्थिरता और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, तीनों को साथ लेकर चलना ही दिल्ली की नई विदेश नीति है।

कहना होगा कि मोदी की चीन यात्रा ने इस सोच को और मजबूत किया है। वहीं, अमेरिकी ट्वीट ने यह दर्शाया कि वॉशिंगटन रिश्तों की बर्फ पिघलाने के लिए पहल करने को तैयार है। कूटनीतिज्ञों का मानना है कि यह “बर्फ की पहली दरार” है, जो आगे चलकर बड़े बहाव का रूप ले सकती है।

सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया

अमेरिकी दूतावास का ट्वीट आते ही सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ आईं। कुछ यूजर्स ने कहा—“अमेरिका को दिखावा बंद करना चाहिए।” किसी ने लिखा, “भारत-अमेरिका रिश्ते अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए हैं।” जबकि कुछ ने माना कि यह अमेरिका की “मजबूरी में की गई दोस्ती” है। लेकिन कूटनीति का खेल अलग होता है। यहाँ भावनाओं से ज्यादा संकेत मायने रखते हैं। और यह ट्वीट दरअसल संकेत ही है कि अमेरिका भारत को खोने का जोखिम नहीं उठा सकता।

नई शुरुआत की ओर

बीजिंग की तस्वीर और वॉशिंगटन का ट्वीट, दोनों घटनाएँ एक साथ एक नई कहानी गढ़ रही हैं। भारत-चीन की दूरी कम होना और अमेरिका का दोस्ताना रुख, दोनों इस ओर इशारा करते हैं कि अब जिस तरह का वैश्‍विक कूटनीतिक परिदृष्‍य बन रहा है, उसमें राष्‍ट्रपति ट्रंप अपने ही देश में घिरते नजर आ रहे हैं। भारत की स्‍पष्‍ट विदेश नीति सही दिशा में कारगर साबित हो रही है। हालांकि आगे सब कुछ सहज हो जाने की प्रक्रिया आसान नहीं है। मतभेद अब भी हैं, चुनौतियाँ बरकरार हैं। लेकिन जब वॉशिंगटन से दोस्ती का संदेश आया है तो दिल्ली ने उसे हल्की मुस्कान के साथ स्वीकार किया है।