फरीदाबाद में महिला की मौत के बाद शव को एम्बुलेंस ना मिलने पर शव को ठेले पर लेकर जाने के मामले में हरियाणा मानवाधिकार आयोग (HHRC) ने टिप्पणी करते हुए सरकार को नई नीति बनाने की सिफारिश की है। आयोग की तरफ से अतिरिक्त मुख्य सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग हरियाणा, महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं तथा सिविल सर्जन-सह-मुख्य चिकित्सा अधिकारी फरीदाबाद को निर्देश दिए हैं कि वे अगली सुनवाई की तिथि से कम से कम एक सप्ताह पूर्व अपनी-अपनी कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करें। आयोग इस मामले में 2 अप्रैल को सुनवाई करेगा। दरअसल, ये पूरा मामला 30 जनवरी का है। गांव सरूरपुर इलाके में रहनी वाली अनुराधा (35) की मौत बीके अस्पताल में मौत हो गई थी। वह टीबी से पीड़ित चल रही थी। अनुराधा की मौत के बाद उसके पति झुनझन को अपनी पत्नी के शव को एक जुगाड़ ठेला (रिक्शा) में लेकर जाना पड़ा था। अस्पताल के कर्मचारियों ने उसको शव के लिए एम्बुलेंस दिलाने में मदद करने की बजाय प्राइवेट एम्बुलेंस करने के लिए कहा था। लेकिन उसके पास इसके लिए 700 रूपए तक नही थी। जिसके बाद उसने फोन करके अपने ससुर को बुलाया और पत्नि के शव को ठेले पर रखकर लेकर चला गया। स्वाथ्य अधिकारियों ने इस मामले में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था। अस्पताल में शव के लिए कोई एम्बुलेंस नहीं है। रेडक्रास के माध्मय से शव के लिए एम्बुलेंस मिलती है, लेकिन महिला के पति ने इसके लिए कंट्रोल रूम में कोई संपर्क नहीं किया था। मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होती मानव गरिमा आयोग के अध्यक्ष ललित बत्रा तथा सदस्य कुलदीप जैन और दीप भाटिया ने इस पह गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि, जीवन का अधिकार केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीने और मरने का अधिकार भी इसमें शामिल है। गरीबी के कारण किसी परिवार को शव को अपमानजनक परिस्थितियों में ले जाने के लिए मजबूर करना राज्य की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियों से गंभीर विमुखता को दर्शाता है। अधिकारियों की असंवेदनशीलता उजागर आयोग ने स्वास्थ्य अधिकारियों के उन बयानों पर भी गंभीर चिंता जताई, जिनमें कहा गया कि सरकारी एम्बुलेंस शवों के परिवहन के लिए नहीं होतीं। आयोग के अनुसार, ऐसे बयान नीतिगत शून्यता और प्रशासनिक असंवेदनशीलता को उजागर करते हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि असली प्रश्न यह नहीं है कि परिवार ने कोई अनुरोध किया या नहीं, बल्कि यह है कि क्या राज्य के पास आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के मृतकों के लिए कोई सुनिश्चित, सुलभ और गरिमापूर्ण शव परिवहन व्यवस्था है या नहीं। प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता आयोग ने कहा कि देश भर में इस प्रकार की कई घटनाएं सामने आती रही हैं, जहां गरीब परिवार बीमार परिजनों या मृत शरीर को ठेले, रिक्शा, मोटरसाइकिल या अन्य अस्थायी साधनों से ले जाने को मजबूर होते हैं। ऐसी घटनाएं किसी एक स्थान की चूक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था की गहरी प्रणालीगत विफलता को दर्शाती है। मृत्यु में गरिमा अधिकार है, दया नहीं आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी राज्य यह अनुमति नहीं दे सकता कि गरीबी यह तय करे कि किसी नागरिक के शरीर के साथ मृत्यु के बाद कैसा व्यवहार किया जाएगा। मृत्यु में गरिमा सुनिश्चित करना कोई दया का कार्य नहीं, बल्कि संवैधानिक और मानवाधिकार संबंधी दायित्व है। नई नीति बनाने की सिफारिश आयोग ने उल्लेख किया कि हरियाणा सरकार गर्भवती महिलाओं को सिविल अस्पतालों तक आने-जाने के लिए निशुल्क एम्बुलेंस सेवा उपलब्ध कराती है। इसी तर्ज पर आयोग ने स्वास्थ्य विभाग, हरियाणा सरकार को यह सिफारिश की है कि एक नीति बनाई जाए, जिसके तहत किसी भी सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के मरीज की मृत्यु होने पर शव को मृतक के निवास स्थान तक निशुल्क और गरिमापूर्ण तरीके से पहुंचाया जाए। वरिष्ठ अधिकारियों से कार्रवाई रिपोर्ट तलब आयोग के सहायक रजिस्ट्रार डॉ. पुनीत अरोड़ा ने बताया कि आयोग ने अतिरिक्त मुख्य सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग हरियाणा, महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं तथा सिविल सर्जन-सह-मुख्य चिकित्सा अधिकारी फरीदाबाद को निर्देश दिए हैं कि वे अगली सुनवाई की तिथि से कम से कम एक सप्ताह पूर्व अपनी-अपनी कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
हरियाणा सरकार शव ले जाने के लिए बनाए नीति:मानवाधिकार आयोग ने की सिफारिश, फरीदाबाद में नहीं मिली थी एम्बुलेंस, अगली सुनवाई 2 को
