मध्यप्रदेश क्राइम फाइल्स में आज बात मंडला जिले के एक ऐसे हत्याकांड की, जिसने पुलिस को दो साल तक उलझाए रखा। जंगल में मिली एक युवक की अर्धनग्न लाश, एक उलझी हुई प्रेम कहानी और सबूतों का ऐसा अकाल कि पुलिस के हाथ दो महीने तक गांव में डेरा डालने के बाद भी खाली रहे। पहली नजर में यह मामला किसी जंगली जानवर के हमले का लग रहा था, लेकिन जब परतें खुलनी शुरू हुईं तो एक ऐसी खौफनाक साजिश सामने आई, जिसने सबके होश उड़ा दिए। क्या थी पूरी कहानी? किसने और क्यों की थी युवक की नृशंस हत्या? पढ़िए क्राइम फाइल्स का पार्ट-1… वो आखिरी फोन कॉल और अंधेरे में गुम हुआ राजेंद्र
तारीख 20 सितंबर 2021, रात के करीब 9:30 बज रहे थे। मंडला के बिछिया थाना क्षेत्र के एक छोटे से गांव में 22 वर्षीय राजेंद्र पन्द्रे अपने चचेरे भाई दिनेश के साथ अपने नए बन रहे प्रधानमंत्री आवास में बैठा था। माहौल सामान्य था, दोनों भाई मोबाइल में कुछ देख रहे थे। तभी राजेंद्र के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर एक लड़की का नाम चमक रहा था। फोन उठाते ही राजेंद्र की आवाज धीमी हो गई और वह बात करते-करते घर से बाहर निकल गया। दिनेश को लगा कि शायद भैया बात करने के बाद पुराने घर चले जाएंगे, जैसा कि वह अक्सर करते थे। तीन दिन तक नहीं मिला कोई सुराग
अगली सुबह जब राजेंद्र घर नहीं लौटा, तो परिवार वालों को चिंता हुई। पिता लखन पन्द्रे ने बताया, राजेंद्र रोज रात 8 बजे खाना खाकर नए बन रहे आवास की चौकीदारी करने जाता था। 20 तारीख को भी वह ऐसे ही गया था। जब वह सुबह नहीं आया, तो हमने उसके मोबाइल पर फोन लगाया, लेकिन फोन बंद आ रहा था। परिवार ने आसपास के गांवों, दोस्तों और सभी रिश्तेदारों में उसकी तलाश शुरू कर दी, लेकिन तीन दिन तक राजेंद्र का कोई सुराग नहीं मिला। जब सारी कोशिशें नाकाम हो गईं, तो हताश पिता ने 23 सितंबर को बिछिया पुलिस थाने में बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पांच दिन बाद जंगल में मिली लाश
राजेंद्र के लापता होने को पांच दिन बीत चुके थे। 25 सितंबर को, परिवार के कुछ लोग और ग्रामीण उसे जंगल में तलाश रहे थे। गांव से करीब दो घंटे की दूरी पर, डोभन वाले जंगल में जब राजेंद्र के चाचा मत्तेसिंह, रमेश और संतराम पहुंचे, तो उन्हें एक असहनीय बदबू ने अपनी ओर खींचा। पास जाकर देखा तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। झाड़ियों के बीच एक युवक का शव पड़ा था, जो बुरी तरह सड़ चुका था। शव अर्धनग्न हालत में था। शरीर पर न तो पैंट थी और न ही अंडरवियर। कीड़े लग चुके थे और चेहरा पहचानना मुश्किल हो रहा था। सबसे भयावह बात यह थी कि शव का प्राइवेट पार्ट गायब था। कपड़ों और हुलिए से शव की शिनाख्त राजेंद्र के रूप में हुई। खबर फैलते ही गांव में सनसनी फैल गई। राजेंद्र की बहन प्रियंका और मां मन्नोबाई भी बदहवास हालत में मौके पर पहुंचीं। पुलिस ने दो थ्योरी पर काम करना शुरू किया
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची। शव की हालत देखकर पुलिस के सामने दो बड़ी थ्योरी थीं:- जंगली जानवर का हमला: क्या राजेंद्र जंगल में गया और किसी तेंदुए का शिकार हो गया? जानवर ने ही उसके शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया? नृशंस हत्या: या फिर किसी ने उसकी हत्या कर पहचान मिटाने और मामले को भटकाने के लिए शव को जंगल में फेंक दिया? प्राइवेट पार्ट का गायब होना किसी गहरी रंजिश या क्रूरता की ओर इशारा कर रहा था। पुलिस ने पहली नजर में इसे हत्या का मामला मानते हुए अज्ञात आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया। जांच की सुई: प्रेम प्रसंग और प्रेमिका का परिवार
पुलिस ने जांच शुरू की तो सबसे पहले परिवार वालों से पूछताछ की। यहीं से इस केस में एक प्रेम कहानी का एंगल सामने आया। राजेंद्र की मां मन्नोबाई ने पुलिस को बताया कि उनके बेटे का गांव की ही एक लड़की सोनल से प्रेम संबंध था। उन्होंने सीधा आरोप लगाते हुए कहा, मुझे शक है कि सोनल के घर वालों ने ही मेरे बेटे को मारा है। जिस रात वह गायब हुआ, मेरा भतीजा दिनेश बता रहा था कि वह सोनल से ही फोन पर बात करते हुए उसके घर की तरफ गया था। इस कहानी की पुष्टि उस रात राजेंद्र के साथ मौजूद आखिरी शख्स, उसके चचेरे भाई दिनेश ने भी की। दिनेश ने बताया, भैया स्वेटर लेने के बाद वापस आए, तभी सोनल का फोन आया। मैंने मोबाइल भैया को दे दिया। वह उससे बात करते-करते उसी के घर की तरफ चले गए थे। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने खोला राज: यह हमला नहीं, हत्या थी
इसी बीच पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आई, जिसने जानवर के हमले की थ्योरी को पूरी तरह खारिज कर दिया। डॉ. दिनेश कुमार टाकसांडे द्वारा की गई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का जो कारण बताया गया, वह बेहद चौंकाने वाला था। मौत गला घोंटने की वजह से हुई थी, जिससे गले की हायड बोन (Hyoid Bone) टूट गई थी। शरीर पर कई जगह चोटों के निशान थे, और सबसे अहम कि प्राइवेट पार्ट को किसी धारदार हथियार से काटा गया था, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव और सदमा लगा। रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया कि राजेंद्र की मौत 4 से 6 दिन पहले हुई थी और यह एक बेहद नृशंस और योजनाबद्ध हत्या थी। दो महीने, पूरा गांव छाना, फिर भी हाथ खाली
हत्या की पुष्टि होते ही पुलिस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। जांच को आगे बढ़ाने के लिए पुलिस की एक टीम ने लगभग दो महीने तक उसी गांव में डेरा डाल लिया। एक-एक घर और एक-एक व्यक्ति से पूछताछ की गई। शक के आधार पर पुलिस ने सोनल के पिता, भाई और कुछ अन्य रिश्तेदारों को हिरासत में लिया। उनसे कई दिनों तक कड़ी पूछताछ की गई, लेकिन वे सभी लगातार इनकार करते रहे। पुलिस को उनके खिलाफ कोई भी ठोस सबूत या कोई ऐसा गवाह नहीं मिला, जो उनके अपराध को साबित कर सके। आखिरकार, सबूतों के अभाव में उन्हें छोड़ना पड़ा। पुलिस का यह रूटीन बन गया था। किसी पर भी जरा सा शक होता, उसे उठाकर थाने लाया जाता, पूछताछ होती और फिर छोड़ दिया जाता। लेकिन हत्या की गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझती जा रही थी। चार महीने बीत चुके थे, लेकिन पुलिस के हाथ एक भी ऐसा सुराग नहीं लगा था, जो उन्हें असली कातिल तक पहुंचा सके। क्राइम फाइल्स पार्ट 2 में पढ़िए… ये भी पढ़ें…
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