फरीदाबाद जिले में चल रहे 39वें इंटरनेशनल सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले की सांस्कृतिक संध्या उस वक्त यादगार बन गई, जब बॉलीवुड और सूफी संगीत के मशहूर गायक कैलाश खेर ने अपनी दमदार प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मंच पर आते ही कैलाश खेर ने जयकारा, सैय्यां (तेरी दीवानी), संयारा जैसे सुपरहिट गीतों से माहौल को पूरी तरह संगीतमय कर दिया, उनकी आवाज पर दर्शक झूमते और तालियां बजाते नजर आए। कार्यक्रम के दौरान मेले में मौजूद हजारों दर्शकों ने कैलाश खेर के गीतों का जमकर आनंद लिया। सूफी, लोक और बॉलीवुड संगीत के अनोखे संगम ने सांस्कृतिक संध्या को खास बना दिया। संघर्ष से सफलता तक का सफर कैलाश खैर का जीवन संघर्ष और साधना की मिसाल है। 7 जुलाई 1973 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे कैलाश खेर का बचपन बेहद साधारण रहा। छोटी उम्र में ही उन्होंने जीवन के कई कठिन दौर देखे। आर्थिक तंगी और निजी संघर्षों के बावजूद संगीत के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ।
कैलाश खेर ने अपने करियर की शुरुआत दिल्ली से की और बाद में मुंबई का रुख किया। शुरुआती दौर में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन उनकी अलग पहचान बनी उनकी सूफी और लोक संगीत से जुड़ी अनोखी आवाज। साल 2003 में फिल्म स्वदेस के गीत “यूं ही चला चल” से उन्हें पहचान मिली, लेकिन असली लोकप्रियता फिल्म पाप के गीत “सैय्यां (तेरी दीवानी)” से मिली, जिसने उन्हें घर-घर मशहूर कर दिया। कैलाश खेर और ‘कैलासा’ बॉलीवुड के साथ-साथ कैलाश खेर ने अपने बैंड ‘कैलासा’ के जरिए सूफी और भारतीय लोक संगीत को नई पहचान दी। अल्लाह के बंदे, जय जय काली शंकरा, चांद सिफारिश जैसे गीतों ने उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच खास जगह दिलाई। कैलाश खेर को उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं। आज वे भारतीय संगीत जगत के उन चुनिंदा कलाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक मजबूत सेतु बनाया है। सूरजकुंड में दिखी संगीत की साधना सूरजकुंड मेले की सांस्कृतिक संध्या में कैलाश खेर की प्रस्तुति ने यह साबित कर दिया कि उनकी आवाज आज भी उतनी ही असरदार है। शिल्प, संस्कृति और संगीत के इस संगम ने मेले की रौनक को और बढ़ा दिया और दर्शकों को एक यादगार शाम का अनुभव मिला।
बॉलीवुड के मशहूर गायक कैलाश खेर पहुंचे फरीदाबाद:सूरजकुंड मेले में दी प्रस्तुति; दर्शकों ने सूफी गीतों का उठाया लुत्फ
