अयोध्या GST डिप्टी कमिश्नर का दिव्यांगता सर्टिफिकेट फर्जी:खुफिया कैमरे पर CMO बोले- फर्जी है, बचेगा नहीं

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यह सर्टिफिकेट पूरी तरह फर्जी है… क्योंकि इस उम्र (31 साल) में यह बीमारी (मैक्युलर डिजनरेशन) हो ही नहीं सकती…। – डॉ. वकील अली, इंचार्ज CMO, डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल, मऊ (प्रशांत सिंह के दिव्यांगता सर्टिफिकेट के बारे में) मऊ के जिला अस्पताल में मैक्युलर डिजनरेशन बीमारी की जांच के लिए न तब कोई मशीन थी, न अब है…। – डॉ. एलएस चौबे, आई सर्जन, जिला अस्पताल, मऊ (यहीं से प्रशांत सिंह का दिव्यांगता सर्टिफिकेट बना, जिसमें आंखों की जांच के लिए OCT मशीन जरूरी है) आई एक्सपर्ट और नोडल अधिकारी के साइन हैं तो ये दिव्यांगता सर्टिफिकेट सरकारी नौकरी के अलावा हर जगह मान्य होगा। – डॉ. घनश्याम यादव, रिटायर्ड CMO, गोंडा (प्रशांत सिंह के दिव्यांगता सर्टिफिकेट पर केवल 3 साइन हैं, 2 नहीं हैं) ऊपर के इन तथ्यों से साफ हो रहा है कि अयोध्या के GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह का दिव्यांगता सर्टिफिकेट फर्जी है। ये वही प्रशांत कुमार सिंह हैं, जिन्होंने अयोध्या में 27 जनवरी को सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया और 4 दिन बाद वापस ले लिया। वे मीडिया के सामने रोए और इस्तीफा देने की वजह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की वह टिप्पणी बताई, जिसमें उन्होंने सीएम योगी के खिलाफ बोला था। प्रशांत पर आरोप लगे कि इस्तीफे की वजह सीएम योगी का समर्थन नहीं, बल्कि अपने दिव्यांगता सर्टिफिकेट के फर्जी होने की कार्रवाई से खुद को बचाना है, क्योंकि 5 साल से इसकी जांच चल रही है और वे जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं, इसलिए मेडिकल बोर्ड के समक्ष जाकर आंखों की जांच कराने से बच रहे हैं। अब तक बोर्ड उन्हें 4 बार बुला चुका है। जबकि इसी दिव्यांगता सर्टिफिकेट के आधार पर प्रशांत सिंह ने दिव्यांग कोटे से सरकारी नौकरी हासिल की है। क्या प्रशांत सिंह का दिव्यांगता सर्टिफिकेट फर्जी है? इस् सवाल के जवाब के लिए दैनिक भास्कर की टीम ने इन्वेस्टिगेशन किया तो एक-एक करके सारी परतें खुलती चली गईं। पढ़िए, पूरा खुलासा… सबसे पहले जानिए, प्रशांत ने क्या कहकर इस्तीफा दिया? मैंने इस्तीफा दे दिया है… मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ… जिसका नमक खाते हैं… उसका फर्ज अदा करना चाहिए… जिस प्रदेश की रोटी खाता हूं… जिस प्रदेश के वेतन से मेरा परिवार चलता है… यदि उस प्रदेश के मुखिया को… जो संवैधानिक तरीके से चुने गए हैं… और असंसदीय शब्दों का प्रयोग किया जाएगा… तो निश्चित रूप से मुझे दर्द होगा…। अब बताते हैं प्रशांत सिंह के दिव्यांगता सर्टिफिकेट के बारे में…
ये सर्टिफिकेट मऊ के CMO ऑफिस से जारी हुआ, इस पर तारीख दर्ज नहीं है। जब 2012 में प्रशांत ने सरकारी नौकरी में अप्लाई करने के लिए CMO ऑफिस से सर्टिफिकेट की कॉपी मांगी तो उस पर ये सर्टिफिकेट जारी होने की तारीख 27 अक्टूबर 2009 दर्ज की गई। सर्टिफिकेट पर प्रशांत की उम्र 31 साल लिखी है। इसमें बीमारी की जगह लिखा है- मैक्युलर डिजनरेशन लेफ्ट आई एंड लॉस ऑफ विजन राइट आई, यानी लेफ्ट आंख में मैक्युलर डिजनरेशन बीमारी है और राइट आंख से देखने की क्षमता कमजोर है। सर्टिफिकेट में प्रशांत को 40% दिव्यांग घोषित किया है। इसमें प्रशांत को परमानेंट दिव्यांगता दी है। इस पर साइन है- आई सर्जन वाईपी गुप्ता के। दूसरी जगह प्रशांत के फोटो के ऊपर सील के साथ भी इन्हीं के साइन हैं। CMO के स्थान पर नोडल अधिकारी डाॅ. बृज कुमार के हस्ताक्षर और सील हैं। एक जगह ऑर्थो सर्जन के साइन हैं, लेकिन ENT सर्जन और फिजिशियन के साइन नहीं हैं। हम लखनऊ से 350 किमी दूर मऊ पहुंचे। यहां इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली से मिले। हमने उनसे हिडन कैमरे पर बातचीत की। उन्होंने बातों-बातों में कई खुलासे किए। साफ कहा- सर्टिफिकेट फर्जी है। ये फर्जी क्यों है? इसका कारण भी बताया। रिपोर्टर: प्रशांत सिंह का दिव्यांगता सर्टिफिकेट क्या फर्जी है…? इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली: ये पूरी तरह से फर्जी है… क्योंकि मैक्युलर डिजनरेशन हो ही नहीं सकता… 31 साल की उम्र में यह बीमारी हो ही नहीं सकती… 40 साल के नीचे हो ही नहीं सकती… जो भी होगी 40 के बाद ही होगी… इसमें चश्मा भी काम नहीं करेगा… और आदमी लिख-पढ़ भी नहीं सकता…। रिपोर्टर: क्या आपके यहां पहले भी कोई ऐसा सर्टिफिकेट बना है…? इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली: नहीं, बनता ही नहीं है…। रिपोर्टर: जिन्होंने बनाया है वो डॉक्टर साहब दोषी हैं कि नहीं…? इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली: पक्का दोषी हैं…। हम समझना चाहते थे कि ये बीमारी कैसे होती है? इसके लिए हमने इंचार्ज CMO से कहा कि वे पूरा एक्सप्लेन करें। इसके बाद डॉ. वकील अली ने कागज-पेन उठाया और डायग्राम बनाकर बताया कि ये सर्टिफिकेट क्यों फर्जी है? ‘जिस डॉक्टर ने ये बीमारी लिखी, वो भी बेवकूफ था’ इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली: ये ऑप्टिक डिस्क है… ये आप्टिक नर्व है… ये रेटिना की कई लेयरें होती हैं… लगभग 10 लेयर होती हैं… रेटिना की… फिर इधर लेंस लगा रहता है… ये आंख होती है… इसमें जो मैक्युलर डिजनरेशन है… वह इस डिस्क में होती है… जहां से ऑप्टिक नर्व है… इसी पर जो फोकल पाइंट होता है… वह मैकुला है… यह सेंसिटिव है… देखिए मैं अन-आफिशियली बता रहा हूं… जिस डॉक्टर ने इस बीमारी को लिखा है… अगर ये नहीं लिखा होता… तो बच जाता… वो भी बेवकूफ था… बस ये समझिए विनाश काले विपरीत बुद्धि…। रिपोर्टर: ये बताइए… मेडिकल बोर्ड में ये बीमारी साबित हो जाएगी या फर्जी साबित हो जाएगी…? इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली: फर्जी साबित हो जाएगी…। रिपोर्टर: क्या इसीलिए प्रशांत सिंह 4 बार से मेडिकल बोर्ड के सामने उपस्थित नहीं हो रहे हैं…? इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली: हां… इसीलिए उपस्थित नहीं हो रहे हैं… ये ही कारण है कि वो फर्जी साबित हो जाएगा…। रिपोर्टर: फाइनली क्या लग रहा है, प्रशांत बच जाएगा…? इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली: बचेगा तो नहीं… लेकिन ये कि लड़ने वाला चाहिए… इसमें मीडिया भी मैनेज हो जाती है…। रिपोर्टर: अगर ईमानदारी से जांच हो गई तो…? इंचार्ज CMO डॉ. वकील अली: फंस गया…। अब हमारे सामने सवाल था कि प्रशांत सिंह के दिव्यांगता सर्टिफिकेट में जो बीमारी मैक्युलर डिजनरेशन लिखी है, क्या डॉक्टर उसकी जांच ऐसे ही कर सकते हैं या फिर किसी मशीन की जरूरत होती है? वो मशीन कौन-सी है? क्या वो मशीन उस अस्पताल में है, जहां से प्रशांत का सर्टिफिकेट बना है? इसके जवाब के लिए हम मऊ के उसी जिला अस्पताल के नेत्र चिकित्सा विभाग पहुंचे, जहां ये सर्टिफिकेट बनाने के लिए प्रशांत की आंखों की जांच की गई थी। यहां सर्टिफिकेट बनाने वाले डॉ. वाईपी गुप्ता रिटायर हो चुके हैं। नेत्र विभाग में हमारी मुलाकात नेत्र सर्जन डॉ. एलएस चौबे से हुई। रिपोर्टर: सर, मैक्युलर डिजनरेशन बीमारी होती है, ये कितने साल की उम्र में होती है…? डॉ. चौबे: हां… एज रिलेटेड बीमारी होती है… ये 60 साल के बाद ही होती है…। रिपोर्टर: इसके लक्षण क्या हैं…? डॉ. चौबे: इसमें विजन नहीं आएगा… इसमें यदि लाइन सीधी है… तो वो टेढ़ी-मेढ़ी दिखेगी… एक्चुअल साइज से छोटा या बड़ा दिखता है…। रिपोर्टर: क्या ये प्रोग्रेसिव (उम्र से बढ़ना और पूरी तरह खत्म नहीं होना) बीमारी है…? डॉ. चौबे: हां… प्रोग्रेसिव बीमारी है…। रिपोर्टर: क्या 30-35 साल की उम्र का कोई मरीज आया है…? डॉ. चौबे: नहीं… इस उम्र में यह बीमारी नहीं होती…। रिपोर्टर: इस बीमारी की जांच के लिए यहां कौन-सी मशीन है…? डॉ. चौबे: इसके लिए यहां कोई मशीन नहीं है… जांच के लिए बाहर भेजते हैं…। रिपोर्टर: आप भी ऐसा करते हैं…? डॉ. चौबे: हां… हम भी पहले BHU भेजते हैं… हम अपने ऊपर नहीं लेना चाहते हैं… इसलिए भेजते हैं…। रिपोर्टर: प्रशांत सिंह के मामले में जांच के लिए 4 बार मेडिकल बोर्ड ने बुलाया… वो आया नहीं… इसका क्या मतलब निकाला जाएगा…? डॉ. चौबे: इसका मतलब कि वो फर्जी है…। रिपोर्टर: जिस डॉक्टर ने सर्टिफिकेट बनाया… उसने कुछ लाभ लिया होगा…? डॉ. चौबे: हां… बिल्कुल लिया होगा… स्वारथ लागि करें सब प्रीती… बिना स्वार्थ के कोई किसी की भलाई करने वाला है…? इसके बाद 3 आई स्पेशलिस्ट से बात की और समझा कि मैक्युलर डिजनरेशन बीमारी में पीड़ित व्यक्ति सामान्य जिंदगी जी सकता है या नहीं? इन सभी डॉक्टरों के जवाब जानिए – 60 साल से ज्यादा उम्र वालों को होती है ये बीमारी
लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल के वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. डीके सर्राफ ने बताया- यह ओल्ड एज की बीमारी है… 60 साल की उम्र से अधिक के लोगों को होती है… इस बीमारी के परीक्षण के लिए बेसिक स्तर पर फंडस एक्जामिनेशन होता है… एडवांस जांच के लिए OCT (ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी) मशीन का प्रयोग किया जाता है…। इसमें काले धब्बे दिखेंगे, लिख-पढ़ नहीं पाते
लखनऊ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी हाॅस्पिटल की रेटिना स्पेशलिस्ट डॉ. पूजा मिश्रा ने बताया- यह बीमारी एज रिलेटेड है… इसमें बेस प्रोडक्ट होते हैं, वह हमारी मैकुला पर एकत्र होने लगता है, इसकी वजह से रोशनी आगे नहीं जा पाती। इसमें मरीज को काले धब्बे दिखाई देते हैं। इसमें चश्में का नंबर नहीं होता, कोई चश्मा लगाने से इसकी रोशनी पर फर्क नहीं पड़ता, इसमें पढ़ने-लिखने वाला सही से देख नहीं पाएगा, जो चीज देखेगी… उसे काले धब्बे दिखाई देंगे। ये प्रोग्रेसिव बीमारी है, उम्र के साथ बढ़ती है
लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल के नेत्र विभाग की HOD डाॅ. कुसुम कला ने बताया- इस बीमारी के कारण धुंधला दिखता है, बीमारी 45 साल की उम्र के बाद ही होती है, यह प्रोग्रेसिव बीमारी है, उम्र के साथ बढ़ती है। यदि सर्टिफिकेट पर आब्जेक्शन है तो सभी के साइन लाना होगा इसके जवाब के लिए हमने गोंडा के रिटायर्ड CMO डॉ. घनश्याम यादव से बात की। उन्होंने बताया कि सबसे बड़े अफसर, एक्सपर्ट के साइन हैं और जहां नौकरी करना है, उस विभाग ने स्वीकार कर लिया है तो ठीक है, यदि कोई आब्जेक्शन आता है तो मेडिकल बोर्ड के सभी सदस्यों के साइन कराना जरूरी हो जाता है। प्रशांत सिंह का सर्टिफिकेट तो बिलकुल गलत है। प्रशांत के बड़े भाई डॉ. विश्वजीत सिंह का भी कहना है कि मेडिकल बोर्ड के 2 सदस्य नहीं थे, फिर भी दिव्यांगता सर्टिफिकेट बना देना अनुचित है। प्रशांत ने खुद अटकाई दिव्यांगजन आयुक्त और मेडिकल बोर्ड की जांच प्रशांत सिंह के बड़े भाई विश्वजीत सिंह ने 16 अगस्त, 2021 को मऊ CMO को शिकायत की। इसके बाद यूपी के दिव्यांगजन आयुक्त को भी शिकायत की। इसमें प्रशांत के दिव्यांगता सर्टिफिकेट की जांच की मांग की। दिव्यांगजन आयुक्त कार्यालय से GST कमिश्नर को निर्देश दिए कि प्रशांत के दिव्यांगता सर्टिफिकेट की जांच कराएं। इसके बाद स्वास्थ्य महानिदेशक के निर्देश पर मामले की जांच शुरू हुई। यह जांच आजमगढ़ मंडलीय मेडिकल बोर्ड कर रहा है। पहली बार 28 सितंबर, 2021 को बोर्ड ने आंखों की जांच के लिए प्रशांत सिंह को बुलाया। इसके बाद 7 अक्टूबर, 2021 को फिर बुलाया, लेकिन प्रशांत सिंह नहीं गए। तीसरी बार 30 नवंबर, 2022 को बुलाया, लेकिन प्रशांत सिंह फिर भी नहीं गए। अब चौथी बार 31 जनवरी 2026 को बुलाया, लेकिन वे नहीं गए। अब बोर्ड 5वीं बार तारीख निकालकर उन्हें बुलाने वाला है। हकीकत ये है कि मेडिकल बोर्ड की जांच खुद प्रशांत सिंह ने अटका रखी है। यदि वे आंखों की जांच के लिए उपस्थित हो जाएं तो साबित हो जाएगा कि उनका दिव्यांगता सर्टिफिकेट फर्जी या नहीं। चारों सवालों के जवाब मिलने के बाद हम उन 3 जिम्मेदारों तक पहुंचे, जो दिव्यांगता सर्टिफिकेट के खेल में शामिल थे- डॉ. बृज कुमार : इन्होंने नोडल अधिकारी के रूप में CMO की जगह हस्ताक्षर कर सर्टिफिकेट जारी किया, जबकि इन्हें पता था कि सर्टिफिकेट में जो बीमारी लिखी है, उसकी जांच जिस मशीन से होती है, वह मऊ के जिला अस्पताल में नहीं है। ये चाहते तो सर्टिफिकेट रोक सकते थे। मैं नहीं, जिसने सर्टिफिकेट बनाया वह दोषी
डॉ. बृज कुमार अब अयोध्या के मंडलीय अस्पताल में वरिष्ठ परामर्शदाता के रूप में तैनात हैं। हमने उनसे पूछा जो बीमारी बताई उसकी जांच की मशीन नहीं होने के बावजूद उन्होंने सर्टिफिकेट क्यों बना दिया? इस पर डॉ. बृज कुमार ने कहा- सर्टिफिकेट बनाने वाला दोषी। डॉ. वाईपी गुप्ता : इन्होंने ही प्रशांत सिंह की आंखों की जांच की और दिव्यांगता सर्टिफिकेट पर 2 जगह साइन करके प्रमाणित किया कि प्रशांत सिंह दिव्यांग है। जबकि ये रेटिना एक्सपर्ट नहीं है, जो बीमारी लिखी है, उसकी जांच रेटिना एक्सपर्ट ही कर सकते हैं। जिम्मेदार आई स्पेशलिस्ट जवाब देने को तैयार नहीं हम प्रशांत सिंह की आंखों की जांच कर सर्टिफिकेट बनाने वाले आई स्पेशलिस्ट डॉ. वाईपी गुप्ता के घर पहुंचे। वे रिटायर होने के बाद बनारस में आनंद नगर कॉलोनी में रहते हैं। यहां उन्होंने अस्पताल बना रखा है। रिसेप्शनिस्ट ने डॉ. गुप्ता को फोन किया। दूसरी ओर से जवाब आने के बाद हमें बताया कि डॉक्टर साहब चंडीगढ़ गए हैं, वे बीमार हैं, कैंसर हो गया है। कीमो करा रहे हैं। थोड़ी देर बाद डॉ. गुप्ता के बेटे डॉ. सौरभ गुप्ता बाहर आए। हमने उन्हें सवाल दे दिए, जिनके अभी तक जवाब नहीं मिले हैं। प्रशांत कुमार सिंह : इन्होंने अपना दिव्यांगता सर्टिफिकेट बनवाया है। इसी के आधार पर दिव्यांग कोटे से सरकारी नौकरी हासिल की। जब सर्टिफिकेट बनवाया तब प्रशांत राजनीतिक में सक्रिय थे, ये मुख्तार अंसारी और अमर सिंह के करीबी रहे हैं। प्रशांत सिंह बोले- मामला कोर्ट में है, जवाब नहीं दूंगा अब इस मामले की सबसे अहम कड़ी GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह से हम कुछ सवालों के जवाब चाहते थे, इसके लिए हम अयोध्या में उनके दफ्तर पहुंचे। यहां से पता चला कि वे लंबी छुट्‌टी पर चले गए हैं। जब उन्हें फोन लगाया तो उन्होंने किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया, हर सवाल के जवाब में एक ही बात बोली- मामला दिव्यांग न्यायालय में लंबित है, मैं कुछ नहीं कहूंगा। ———————— ये खबर भी पढ़ें… UP की ट्रेनों में रिश्वत का सिस्टम अटेंडर्स पर शिफ्ट:सुरक्षा से खिलवाड़ कर बेच रहे सीट, TTE खा रहे आधा पैसा प्रयागराज तक जाना है ना… कोई दिक्कत नहीं। यहां लेट जाइए, ये हमारी सीट है। दो लोगों के 600 रुपए लगेंगे। टीटी को मैं 300 रुपए दूंगा, टीटी चुप हो जाएगा… कुछ नहीं कहेगा। 300 रुपए उसके हो जाएंगे और 300 रुपए मेरे हो जाएंगे…। यूपी में ट्रेनों के AC कोच में रिश्वत लेकर एंट्री दी जा रही। यह काम अटेंडर्स के जरिए TTE (Travelling Ticket Examiner) करवा रहे, ताकि रिश्वत लेते पकड़े न जाएं। इधर, अटेंडर आउटसोर्स के कर्मचारी होते हैं, इसलिए उन पर रेलवे एक्शन नहीं ले पाता। पढ़ें पूरी खबर