इजराइल-ईरान युद्ध से बासमती चावल निर्यात पर संकट:लाखों टन माल बंदरगाहों पर फंसा, गल्फ देशों में निर्यात ठप, फ्रेट और इंश्योरेंस महंगा

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इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर अब भारत के बासमती चावल उद्योग पर भी साफ दिखाई देने लगा है। युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट के समुद्री रूट प्रभावित हो गए हैं। जिससे भारत से होने वाला चावल निर्यात रुक गया है। सबसे बड़ी बात मिडिल ईस्ट में 70 से 75 प्रतिशत चावल का निर्यात होता है। इसके अतिरिक्त 30 लाख टन की हिस्सेदारी इरान, इराक और सउदी अरब की है। लाखों टन बासमती चावल बंदरगाहों और समुद्र में फंसा हुआ है। निर्यातकों को फ्रेट और इंश्योरेंस के बढ़े खर्च का भी सामना करना पड़ रहा है। जो किराया प्रति कंटेनर 500 से हजार डॉलर था, वह 3 हजार डॉलर तक पहुंच गया है। इससे राइस मिलर्स, ट्रांसपोर्टर और लेबर तक के सामने संकट की स्थिति बनती नजर आ रही है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल ने दैनिक भास्कर डिजिटल से खास बातचीत में बताया कि युद्ध के कारण गल्फ देशों में चावल भेजने की प्रक्रिया लगभग रुक गई है। इससे भारत के बासमती चावल व्यापार पर गंभीर असर पड़ रहा है और यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो राइस मिलों को बंद करने की नौबत भी आ सकती है। पिछले साल 60 लाख टन चावल निर्यात, इस साल 65 लाख टन का लक्ष्य था
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल ने बताया कि पिछले वर्ष भारत से लगभग 60 लाख टन यानी 6 मिलियन टन बासमती चावल विभिन्न देशों में निर्यात किया गया था। इस वर्ष निर्यातकों ने 65 लाख टन चावल निर्यात करने का लक्ष्य रखा था और उद्योग उसी दिशा में आगे बढ़ रहा था। उन्होंने बताया कि युद्ध से पहले निर्यात सामान्य रूप से चल रहा था और लगातार नए ऑर्डर मिल रहे थे, लेकिन इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद समुद्री परिवहन पर सीधा असर पड़ा है। इसका परिणाम यह हुआ कि कई देशों के लिए भेजे जाने वाले शिपमेंट प्रभावित हो गए। 11-12 गल्फ देशों में निर्यात लगभग बंद
सतीश गोयल के अनुसार युद्ध का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे गल्फ क्षेत्र पर पड़ा है। उन्होंने बताया कि लगभग 11 से 12 देशों में भारत का चावल निर्यात फिलहाल लगभग बंद हो गया है। उन्होंने कहा कि जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण न तो नए जहाज लग पा रहे हैं और न ही पहले से भरे हुए जहाज अपनी मंजिल तक पहुंच पा रहे हैं। इस वजह से बड़ी मात्रा में बासमती चावल भारत के बंदरगाहों पर ही अटक गया है। कंडला सहित कई बंदरगाहों पर लाखों टन चावल फंसा
गोयल ने बताया कि भारत के कंडला सहित कई बड़े बंदरगाहों पर लाखों टन चावल फंसा हुआ है। इतना ही नहीं, जो जहाज पहले ही समुद्र में निकल चुके थे, उनमें भरा माल भी बीच रास्ते में अटक गया है। उन्होंने कहा कि जिन जहाजों के पास पास के बंदरगाहों तक पहुंचने का विकल्प था, उनके माल को दुबई के जबल अली पोर्ट, शारजाह पोर्ट और ओमान के सलाला पोर्ट जैसे स्थानों पर उतार दिया गया है। अब निर्यातकों के सामने यह समस्या खड़ी हो गई है कि जो चावल सऊदी अरब या ईरान जैसे देशों के लिए भेजा गया था, उसे वहां तक कैसे पहुंचाया जाएगा। गोयल ने कहा कि इस अनिश्चितता के कारण पूरी ट्रेड चिंता में है और निर्यातक लगातार भारत सरकार के संपर्क में हैं। मिडिल ईस्ट पर 70 से 75 प्रतिशत निर्यात निर्भर
सतीश गोयल ने बताया कि भारत के बासमती चावल निर्यात का सबसे बड़ा बाजार मिडिल ईस्ट है। कुल निर्यात का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र में जाता है। उन्होंने बताया कि ईरान, इराक और सऊदी अरब जैसे देशों में ही करीब 30 लाख टन चावल भेजा जाता है। इनमें से हर देश में लगभग 10-10 लाख टन चावल का निर्यात होता है। ऐसे में जब पूरा मिडिल ईस्ट क्षेत्र युद्ध के कारण अस्थिर हो गया है तो इसका सीधा असर भारतीय चावल व्यापार पर पड़ रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य रूट प्रभावित, शिपिंग में रुकावट
गोयल ने बताया कि गल्फ देशों में चावल भेजने का प्रमुख समुद्री मार्ग हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते जाता है। युद्ध के कारण इसी रूट पर जोखिम बढ़ गया है, जिससे शिपिंग कंपनियां भी सावधानी बरत रही हैं। उन्होंने कहा कि इसी कारण निर्यात में पूरी तरह रुकावट आ गई है। इस रूट से केवल चावल ही नहीं बल्कि तेल और गैस की सप्लाई भी होती है। कई देशों में ऊर्जा संकट की खबरें भी सामने आ रही हैं। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो न केवल भारतीय चावल उद्योग बल्कि गल्फ देशों में खाद्यान्न आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। फ्रेट 3 गुना तक बढ़ा, इंश्योरेंस भी महंगा
युद्ध के कारण सबसे बड़ा आर्थिक दबाव फ्रेट और इंश्योरेंस के रूप में सामने आया है। गोयल ने बताया कि जहाज के किराये में भारी वृद्धि हो गई है। उन्होंने बताया कि पहले गल्फ देशों के लिए एक कंटेनर भेजने का किराया 500 से 1000 डॉलर के बीच होता था। एक कंटेनर में लगभग 24 टन चावल भरा जाता है। लेकिन अब यही किराया बढ़कर करीब 3000 डॉलर प्रति कंटेनर तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि निर्यातकों पर लगभग 100 डॉलर प्रति टन का अतिरिक्त खर्च पड़ रहा है। इसके अलावा इंश्योरेंस कंपनियों ने भी युद्ध जोखिम के कारण प्रीमियम बढ़ा दिया है। गोयल के अनुसार अतिरिक्त सुरक्षा कवरेज लेने के कारण निर्यातकों पर 50 से 100 डॉलर प्रति टन तक का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। 31 मार्च क्लोजिंग के कारण व्यापारियों पर दबाव
गोयल ने बताया कि 31 मार्च के आसपास वित्तीय वर्ष की क्लोजिंग होती है। ऐसे समय में व्यापारियों और बैंकों दोनों को अपने हिसाब-किताब पूरे करने होते हैं। लेकिन निर्यात रुकने के कारण व्यापारियों पर अतिरिक्त दबाव बन गया है। उन्होंने कहा कि बासमती चावल की कीमतों पर भी दबाव देखने को मिल रहा है, क्योंकि माल बंदरगाहों और गोदामों में अटका हुआ है। किसानों को फिलहाल ज्यादा असर नहीं
सतीश गोयल का कहना है कि फिलहाल किसानों पर इस संकट का सीधा असर कम है। उन्होंने बताया कि किसानों की पिछली फसल अच्छे दामों में बिक चुकी है और अभी नई फसल लगाने का समय है। लेकिन राइस मिलर्स और एक्सपोर्टर्स के लिए स्थिति कठिन होती जा रही है, क्योंकि उनके पास बड़ी मात्रा में तैयार चावल का स्टॉक पड़ा हुआ है। ईरान के साथ भुगतान की समस्या पहले से
गोयल ने बताया कि ईरान के साथ व्यापार में पहले से ही भुगतान और बैंकिंग से जुड़ी चुनौतियां रही हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और बैंकिंग सीमाओं के कारण भुगतान की प्रक्रिया हमेशा आसान नहीं रही। अब युद्ध के कारण यह जोखिम और बढ़ गया है। अगर संघर्ष लंबा चलता है तो निर्यातकों के लिए भुगतान प्राप्त करना और भी मुश्किल हो सकता है। हरियाणा-पंजाब के राइस मिलर्स सबसे ज्यादा प्रभावित
गोयल ने कहा कि भारत से होने वाले बासमती चावल निर्यात का बड़ा हिस्सा हरियाणा और पंजाब से होता है। लगभग 60 से 70 प्रतिशत निर्यात इन्हीं दो राज्यों से किया जाता है। इसलिए इस संकट का सबसे ज्यादा असर भी इन्हीं राज्यों के राइस मिलर्स और व्यापारियों पर पड़ रहा है। उनके पास बड़ी मात्रा में चावल का स्टॉक जमा है, जिसे निर्यात नहीं किया जा पा रहा। उन्होंने बताया कि उद्योग से जुड़े लोग लगातार इस समस्या के समाधान को लेकर आपस में चर्चा कर रहे हैं और सरकार के साथ भी बातचीत चल रही है। सरकार से राहत की मांग
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने इस स्थिति को देखते हुए भारत सरकार से कई मांगें की हैं। सतीश गोयल ने बताया कि एसोसिएशन के प्रतिनिधि दो बार सरकार से मुलाकात कर चुके हैं। उन्होंने मांग की है कि युद्ध के कारण बढ़े फ्रेट और इंश्योरेंस का अतिरिक्त बोझ निर्यातकों पर नहीं डाला जाना चाहिए। इसके अलावा बंदरगाहों पर फंसे माल को निकालने के दौरान कोई अतिरिक्त डैमरेज या अन्य शुल्क भी नहीं लिया जाए। सरकार ने उद्योग को आश्वासन दिया है कि इस समस्या के समाधान के लिए उचित कदम उठाए जाएंगे और जरूरत पड़ने पर नीति संबंधी फैसले भी लिए जाएंगे। युद्ध लंबा चला तो राइस मिल बंद होने का खतरा
गोयल ने चेतावनी दी कि यदि युद्ध लंबा चलता है तो उद्योग को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार गल्फ देश ही हैं। इनके अलावा इतना बड़ा वैकल्पिक बाजार उपलब्ध नहीं है जहां इतना ज्यादा चावल भेजा जा सके। अगर बंदरगाहों और समुद्र में फंसा माल लंबे समय तक सप्लाई नहीं हो पाया तो कई राइस मिलों को मजबूरन बंद करना पड़ सकता है। लेबर, ट्रांसपोर्टर और ड्राइवर भी प्रभावित होंगे
गोयल ने बताया कि राइस मिल उद्योग से बड़ी संख्या में लोग जुड़े हुए हैं। एक बड़ी राइस मिल में लगभग 200 मजदूर काम करते हैं और इनमें से अधिकांश मजदूर बिहार और उत्तर प्रदेश से आते हैं। उन्होंने बताया कि अभी काम की गति थोड़ी धीमी हुई है। पहले जहां मिलों में 24 घंटे काम होता था, अब लगभग 17 से 18 घंटे ही काम चल रहा है। अगर युद्ध एक सप्ताह के भीतर खत्म हो जाता है तो उद्योग इस स्थिति को संभाल लेगा और मजदूरों पर कोई संकट नहीं आने दिया जाएगा। लेकिन अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो लेबर, ट्रांसपोर्टर और ठेकेदारों तक पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जो ट्रांसपोर्टर चावल को बंदरगाहों तक पहुंचाते थे, वे भी इस समय लगभग खाली बैठे हैं। बिजली, बैंक ब्याज और स्थाई खर्च बढ़ेंगे
गोयल ने बताया कि अगर उत्पादन रुकता है तो भी मिलों को कई तरह के स्थाई खर्च उठाने पड़ते हैं। बिजली के बिल, बैंक से लिए गए कर्ज का ब्याज और स्थाई कर्मचारियों की तनख्वाह जैसे खर्च जारी रहते हैं। उन्होंने कहा कि भले ही काम कम हो जाए, लेकिन स्थाई कर्मचारियों को वेतन देना ही पड़ता है। ठेकेदार के मजदूरों को कुछ समय के लिए कम किया जा सकता है, लेकिन अगर संकट लंबा चला तो उनकी रोजी-रोटी पर भी असर पड़ेगा। लोकल मार्केट में बासमती की मांग कम
सतीश गोयल ने बताया कि बासमती चावल का बाजार मुख्य रूप से निर्यात पर ही निर्भर करता है। भारत के घरेलू बाजार में इसकी मांग सीमित है और यहां निर्यात के बराबर कीमत भी नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि निर्यातकों ने जो चावल तैयार किया है वह ज्यादातर विदेशी बाजारों के लिए होता है। अगर युद्ध लंबा चलता है तो इस स्टॉक को लोकल बाजार में बेच पाना आसान नहीं होगा। उन्होंने सरकार से अपील की कि जल्द से जल्द ऐसा समाधान निकाला जाए जिससे भारतीय बंदरगाहों पर फंसा चावल गल्फ देशों तक पहुंच सके और उद्योग को राहत मिल सके।