हमारा टारगेट है कि मध्य प्रदेश के सभी 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को फर्स्ट रेफरल यूनिट (FRU) के रूप में विकसित किया जाए ताकि जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज में केवल रेफर केस ही पहुंचे। इसका पूरा रोड मैप तैयार है। ये कहना है राज्य के डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल का। दैनिक भास्कर डिजिटल के स्टेट एडिटर कपिल भटनागर से बातचीत में शुक्ल ने ये भी कहा कि रीवा और आसपास के जिलों में कफ सिरप को नशे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पर हमने प्रभावी रोक लगाने की कोशिश की है। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि इस साल उनकी क्या प्राथमिकताएं हैं, पढ़िए पूरी बातचीत… 1. बतौर उपमुख्यमंत्री आपने दो साल पूरे किए हैं। सबसे बड़ी उपलब्धि किसे मानते हैं?
राजेंद्र शुक्ल: मैं अपने विभाग की बात करूं तो ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी और मानव संसाधन की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। उसे दूर करने के लिए ही इन दो वर्षों में हमने 39 हजार पद स्वीकृत किए हैं। जिनमें भर्ती की प्रक्रिया शुरू हो गई है। करीब साढ़े चार हजार लोग आ भी गए हैं। बाकी की भर्ती प्रक्रिया चालू है, बहुत जल्दी लोग हमें मिल जाएंगे। जहां स्टाफ की कमी है, वहां उनकी पोस्टिंग करके मानव संसाधन की पूर्ति करेंगे। डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए हमारे घोषणा पत्र में भी था कि हम हर लोकसभा क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज खोलेंगे। चार लोकसभा क्षेत्रों को छोड़ दें तो 25 लोकसभा क्षेत्रों में मेडिकल कॉलेज शुरू हो गए हैं। कुछ में काम चल रहा है। आने वाले वर्षों में 6 मेडिकल कॉलेज नए और मिलेंगे। साल 2003 के पहले महज 5 मेडिकल कॉलेज थे। आज 19 सरकारी और 14 प्राइवेट मेडिकल कॉलेज हैं। तीन साल में हम मेडिकल कॉलेजों की संख्या 50 से ऊपर ले जाएंगे। गर्भवती महिलाओं का पंजीयन और जांच के लिए हर महीने की 9 और 25 तारीख तय है। इन तारीखों में उन जगहों पर डॉक्टरों की व्यवस्था की जाती है, जहां डॉक्टर नहीं होते। इन तारीखों को आशा वर्कर सेंटर्स पर हाई रिस्क प्रेग्नेंट लेडीज को लेकर आती हैं। वहां डॉक्टर उनका चेकअप करते हैं। यदि आवश्यकता होती है, तो उनका ब्लड ट्रांसफ्यूजन भी होता है। हायर हेल्थ सेंटर में उन्हें रेफर भी किया जाता है। इससे आईएमआर और एमएमआर में गिरावट आई है। मप्र में मातृ मृत्यु दर 173 से घटकर 137 पर आ गई है। वहीं, शिशु मृत्यु दर 48 से घटकर 37 पर आ गई है। ये आंकड़ा लगातार घट रहा है। 2. छिंदवाड़ा कफ सिरप केस, इंदौर एमवाय चूहा कांड या सतना में HIV संक्रमित ब्लड चढ़ाने का मामला हो, इनमें प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई?
राजेन्द्र शुक्ल: उसके लिए एक्शन लिए हैं। जैसे छिंदवाड़ा कफ सिरप के मामले में भारत सरकार का जो एक्ट है, उसके अनुसार यदि देश में कहीं कोई मेडिसिन फैक्ट्री खुलती है तो उसका लाइसेंस राज्य देता है और उसका रिन्युअल भी वही राज्य करता है। वो दवाई यदि गवर्नमेंट सप्लाई नहीं है तो सेल्फ सर्टिफिकेशन उसी को करना होता है। यदि कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट के तहत दस साल की सजा होती है। वो जिम्मेदारी उसको ही लेना है। लाइसेंस राज खत्म करने के अभियान के अंतर्गत सेल्फ सर्टिफिकेशन भारत सरकार के एक्ट के अंतर्गत उसको करना था। वो फैक्ट्री तमिलनाडु में थी। तमिलनाडु सरकार ने उसको लाइसेंस दिया और उसका रिन्युअल भी किया। उनके द्वारा सप्लाई की गई दवा यहां मप्र में जबलपुर के स्टॉकिस्ट के पास आई और स्टॉकिस्ट के जरिए छिंदवाड़ा गई। वह दवा हमारे यहां सप्लाई नहीं हो रही थी। जब कोई दवाई सरकारी सप्लाई में आती है तो उसके हर बैच के सैंपल की जांच कराते हैं। उसके बाद ही उसे सप्लाई के लिए अनुमति देते हैं। हमने इस मामले में एसआईटी बनाई। कंपनी के मालिक को चेन्नई से गिरफ्तार कर लाए और स्टॉकिस्ट, डिस्ट्रीब्यूटर के खिलाफ भी कार्रवाई की। अब सरकार ने तय किया है कि भोपाल के अलावा इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में भी जांच लैब शुरू कर रहे हैं। इसे अपडेट भी कर रहे हैं, भर्तियां कर रहे हैं। हर संभागीय मुख्यालय पर सैंपलिंग और टेस्टिंग बढ़ाएंगे। छिंदवाड़ा की घटना में जो मौजूदा नियम और कानून थे, उनके तहत कार्रवाई की है। एमवाय अस्पताल में चूहों की जो बात है, एमवाय अस्पताल की बहुत पुरानी बिल्डिंग है। ड्रेनेज सिस्टम से चूहे आते हैं या बिल बना लिए हैं। वो बहुत ही अन हाईजीनिक कंडीशन में था। उस पूरे कैम्पस के री-डेवलपमेंट का प्लान बनाया है। इसके लिए 772 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस प्रोजेक्ट का भूमिपूजन हो चुका है। ये बहुत ही पुरानी समस्या है। अभी हमारे चीफ सेक्रेटरी जब इंदौर कलेक्टर थे, तब उन्होंने अभियान चलाकर दस से बीस हजार चूहों को मरवाने का का काम किया था। मगर, ये कोई परमानेंट सॉल्यूशन नहीं है, इसलिए पूरा री-डेवलपमेंट प्लान तैयार किया है। इसी तरह 2003 के पहले जो पांच मेडिकल कॉलेज थे, उन सभी के लिए री डेवलपमेंट प्लान बनाकर काम कर रहे हैं। सतना के मामले में ब्लड बैंक की और ज्यादा निगरानी करने की आवश्यकता है, क्योंकि थैलेसीमिया के मरीज वे छह बच्चे थे। थैलेसीमिया मरीजों को महीने में तीन बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन करना पड़ता है। यदि ब्लड नहीं चढ़ाते हैं तो उनका जीवन खतरे में पड़ सकता है। इस मामले के बाद हम ये तय कर रहे हैं कि केवल रैपिड टेस्ट के आधार पर ब्लड डोनेशन न कराया जाए। हमारी कोशिश है कि यदि कोई अपग्रेडेड टेस्ट है तो उसे अप्लाय कर ब्लड डोनेशन कराएं। ब्लड बैंक में जो स्टाफ है, उसकी गहराई से जांच कर रहे हैं कि उन्होंने कहीं कोई लापरवाही तो नहीं की है? अभी तो सस्पेंशन हो गए हैं। 3. प्रदेश के 19 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में से 7 में पढ़ाने के लिए न तो फैकल्टी है न ही इक्विपमेंट, डॉक्टर कैसे तैयार होंगे?
राजेंद्र शुक्ल: जो नए मेडिकल कॉलेज शुरू हो रहे हैं, उनमें फर्स्ट ईयर के जो तीन कोर्सेज होते हैं, उसके फैकल्टी डॉक्टरों की उपलब्धता के बगैर हमें मान्यता ही नहीं मिलेगी। तभी एनएमसी मान्यता देती है। उसके बाद जैसे-जैसे बच्चे सेकेंड, थर्ड ईयर में जाते हैं तो विज्ञापन और वॉक इन इंटरव्यू के माध्यम से विभागीय मॉडल के अनुसार फैकल्टी मिलती जाती है। ये बात सही है कि जिस तेजी से हम मेडिकल कॉलेज खोल रहे हैं, उनमें फैकल्टी मिलना एक चुनौती है। शहडोल मेडिकल कॉलेज का उदाहरण देख लीजिए। शुरुआत में वहां भर्ती की तो फैकल्टी की बड़ी परेशानी हुई। अभी हाल ही में जो 50 असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर की भर्ती की, उनमें 26 अकेले शहडोल मेडिकल कॉलेज के लिए थे। ये सभी के लिए बड़ा आश्चर्य का विषय था। धीरे-धीरे रोल आउट हो रहा है और लोग आ रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अगले एक साल में क्या हासिल करना चाहते हैं?
राजेंद्र शुक्ल: सरकार की दो साल की उपलब्धियों के बाद अगले एक वर्ष का सबसे बड़ा लक्ष्य हेल्थ सेक्टर में कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स (CHC) को पूरी तरह कार्यशील बनाना है। प्रत्येक कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में छह विशेषज्ञ पद होते हैं और उनकी इमारत लगभग 18 से 20 करोड़ रुपए की होती है। हमने सभी आवश्यक पद स्वीकृत कर दिए हैं और लक्ष्य है कि प्रदेश के सभी 348 कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स को फर्स्ट रेफरल यूनिट (FRU) के रूप में विकसित किया जाए। इसका फायदा यह होगा कि सामान्य और आवश्यक सर्जरी, रेडियोलॉजी, एनेस्थीसिया जैसी सुविधाएं वहीं उपलब्ध होंगी। केवल गंभीर मामलों को ही जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ेगा। इससे वहां की भीड़ भी कम होगी। 4. रीवा से इंदौर हवाई सेवा का शुरुआती रिस्पांस अच्छा है। क्या आगे भी ऐसा ही रिस्पांस रहेगा?
राजेंद्र शुक्ल: रीवा और विंध्य क्षेत्र में बहुत पोटेंशियल है। मैंने 13-14 साल पहले पहली बार सिविल एविएशन मिनिस्ट्री को चिट्ठी लिखी थी कि रीवा में एयरपोर्ट बनना बहुत जरूरी है। वहां पर 40 मिलियन टन सीमेंट बनती है। 15 हजार मेगावॉट कोयले से बिजली बनती है। बांधवगढ़, संजय गांधी और पन्ना तीन-तीन नेशनल पार्क हैं। मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर वर्ल्ड क्लास सफारी है। धार्मिक दृष्टि से देखें तो मैहर की शारदा माई का धाम, चित्रकूट है। यदि बाणसागर का बांध और रीवा का एयरपोर्ट पहले बन गया होता तो विंध्य क्षेत्र किसी भी देश और प्रदेश की प्रगति से अपना मुकाबला कर रहा होता। मैंने जो पत्र लिखा, उसके बाद फिजिबिलिटी स्टडी हुई, उसमें यह पाया गया कि ये वास्तव में ये फिजिबल है और साल 2023 में भूमिपूजन हुआ। साल 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस से इसका वर्चुअल लोकार्पण किया और 2025 में हमें दो एटीआर मिल गए। अलायंस एयर रीवा से दिल्ली और इंदौर से रीवा इंडिगो एयरलाइंस के जरिए पुणे बैंगलोर कई शहरों की कनेक्टिविटी बढ़ गई है। आप पता करेंगे तो रीवा दिल्ली 72 सीटर विमान में ऑक्यूपेंसी 65-66 रहती है। 22 तारीख को जो रीवा इंदौर का विमान शुरू हुआ है, उसमें भी 55-60 यात्री सफर कर रहे हैं। 5. रीवा में कफ सिरप और नशे की तस्करी व बिक्री के मामले सामने आते रहे हैं। इसे रोकने के लिए क्या योजना है?
राजेंद्र शुक्ल: इसके लिए हमने पुलिस तंत्र को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कोई भी कसर न छोड़ी जाए। हमने इस विषय पर कई बार पुलिस अधिकारियों के साथ बैठकें की हैं। जब भी कोई एसपी या डीआईजी यहां पदभार ग्रहण करता है, तो मैं उनसे स्पष्ट रूप से कहता हूं कि मेरी उनसे केवल एक ही अपेक्षा है- रीवा से कोरेक्स और नशे को पूरी तरह समाप्त करना। रीवा तेजी से विकसित हो रहा है, लेकिन यदि आने वाली पीढ़ी नशे की गिरफ्त में चली जाएगी, तो यह विकास किस काम का रहेगा? यह बात पुलिस अधिकारियों को भीतर तक झकझोरती है और वे पूरी ताकत से कार्रवाई कर रहे हैं। पुलिस अधिकारियों ने हमें बताया कि उत्तर प्रदेश में एनडीपीएस एक्ट उतनी सख्ती से लागू नहीं होता था, जितना मध्य प्रदेश में होता है। वहां अवैध मात्रा से कम होने पर कठोर कार्रवाई नहीं होती थी। इस पर मैं स्वयं उत्तर प्रदेश गया और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर पूरी स्थिति उन्हें बताई। मुझे खुशी है कि अब उत्तर प्रदेश में भी एनडीपीएस एक्ट उसी सख्ती से लागू किया जा रहा है, जैसा मध्य प्रदेश में होता है। इससे वहां से होने वाली घुसपैठ भी काफी हद तक बंद हुई है। अब तक लगभग 800 लोग जिलों में एनडीपीएस एक्ट और कोरेक्स तस्करी के मामलों में जेल में बंद हैं। हमने इस मुद्दे को दबाने के बजाय खुलकर सामने रखा और इसे चर्चा का विषय बनाया। 7. ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुधार के लिए क्या योजना है?
राजेंद्र शुक्ल: ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी को टेलीमेडिसिन के माध्यम से काफी हद तक पूरा किया जा सकता है। यदि सब-हेल्थ सेंटर और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मौजूद डॉक्टर मेडिकल कॉलेजों के विशेषज्ञों से टेलीमेडिसिन के जरिए परामर्श लेने की आदत बना लें, तो अधिकांश मरीजों का इलाज वहीं संभव हो जाएगा। जैसे यूपीआई को लेकर शुरुआत में संदेह था, लेकिन आज देश दुनिया में सबसे आगे है। ठेले वाला और ऑटो चालक भी मोबाइल से भुगतान कर रहा है। वैसे ही यदि टेलीमेडिसिन की आदत बन गई, तो ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में यह एक बड़ा बदलाव साबित होगा। हमने हब एंड स्पोक मॉडल पर लैब सुविधाएं भी विकसित कर ली हैं, जहां सभी प्रकार की जांच संभव है। स्वास्थ्य क्षेत्र में हमारा दृष्टिकोण तीन चरणों पर आधारित है। जिसमें पहला प्रिवेंटिव केयर हैं यानी लोग समय-समय पर जांच कराएं ताकि बीमारी होने से पहले ही रोकी जा सके। दूसरा क्यूरेटिव केयर है यानी संभागीय मुख्यालयों पर सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल हो, जहां कैंसर, किडनी, लिवर, हार्ट सर्जरी, एंजियोप्लास्टी और ट्रांसप्लांट उपलब्ध हों। तीसरा जीरिएट्रिक केयर है, जिसमें 70 साल से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों को 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज की सुविधा मिल सके। पिछले दो सालों में हमने इस दिशा में मजबूत आधार तैयार किया है। आने वाले एक वर्ष में हमारा लक्ष्य है कि इन योजनाओं को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए। ये खबर भी पढ़ें… मौतों की जिम्मेदारी किसकी? पार्षद तो छोटा आदमी… इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 16 मौतों ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं। अभी कई लोगों का इलाज चल रहा है। सरकार एक्शन में दिखी, मगर बहुत देर से। दैनिक भास्कर ने जब इस इलाके के विधायक और प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से पूछा कि चूक कहां हुई? तो उन्होंने कहा इस त्रासदी के लिए 200 फीसदी अधिकारी ही जिम्मेदार हैं। पढ़ें पूरी खबर…
कफ सिरप ‘कलंक’ नहीं लगता…डिप्टी सीएम बोले-हम कंट्रोल कर रहे:डॉक्टरों की कमी पर कहा- दो साल में हमने 39 हजार पद स्वीकृत किए
