चंडीगढ़, 30 अक्टूबर । हरियाणा की ऐतिहासिक धरोहरों को दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर लाने की विरासत एवं पर्यटन मंत्री डाॅ. अरविंद शर्मा की कवायद अब रंग ला रही है। देश की राजधानी दिल्ली के साथ लगते दक्षिण हरियाणा में सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रहे कानोड किला (महेन्द्रगढ किला) और सोहना किला समेत आधा दर्जन ऐतिहासिक धरोहरों को राज्य संरक्षित स्थल की सूची में शामिल किया गया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से मंजूरी के बाद पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा इसकी प्रारंभिक अधिसूचना जारी कर दी गई है। राष्ट्रीय ही नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय महत्व की इन धरोहरों का अब संरक्षण एवं सौंदर्यीकरण का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
विरासत एवं पर्यटन मंत्री डाॅ अरविंद शर्मा ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि महेन्द्रगढ जिला में 18वीं शताब्दी में मराठा सेनापति तात्या टोपे द्वारा तैयार कानोड किला (महेन्द्रगढ किला), गुरूग्राम जिला में भरतपुर राजाओं द्वारा तैयार सोहना किला, पलवल जिला में प्राचीन बस्तियों अहरवां, आशा खेडा व कोडला खेडा व रेवाडी रियासत की धरोहर पांच छतरियों के समूह को राज्य संरक्षित स्थल के तौर पर प्रदेश सरकार द्वारा मंजूरी प्रदान की गई है। उन्होंने कहा कि शीघ्र इन धरोहरों के संरक्षण, सौंदर्यीकरण को लेकर विशेष कार्य योजना बनाई जाएगी, ताकि सभी धरोहरों और इतिहास को देश, दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जा सके। कैबिनेट मंत्री डाॅ. अरविंद शर्मा ने कहा कि अब प्रदेश में राज्य संरक्षित स्थलों की संख्या बढकर 66 हो गई है। इसमें वर्ष 2022 से अब तक 26 नई राज्य संरक्षित स्थल को मंजूरी मिली हैं, जबकि 20 धरोहरों को इस सूची में लाने के प्रस्ताव पर काम चल रहा है।
विरासत एवं पर्यटन मंत्री डाॅ. अरविंद शर्मा ने बताया कि कानोड किला उत्तर भारत में मराठा प्रभाव के विस्तार का प्रमाण है। वर्ष 1860 में अंग्रेजों के शासन के दौरान किला व आसपास का इलाका पटियाला रियासत में शामिल होने के बाद पटियाला के महाराजा नरेन्द्र सिंह ने अपने पुत्र महेन्द्र सिंह के नाम पर किले का नाम बदलकर महेन्द्रगढ कर दिया था। यह किला राजपूत वास्तुकला, मुगल व मराठा शैलियों की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक प्रभावाें को सजीवटता प्रदान करता है। इसी प्रकार हरियाणा के सबसे पुराने किलों में शामिल सोहना किला मध्यकाल के सामरिक महत्व को दर्शाता है। राजपूत व मुगल स्थापत्य शैली के मिश्रण के अवशेष सोहना किला में पाए गए हैं।
कैबिनेट मंत्री डाॅ. अरविंद शर्मा ने बताया कि रेवाड़ी रियासत में पांच छतरियों के समूह का निर्माझा राव नंदराम के वंशजों द्वारा करवाया गया था। महान स्वतंत्रता सेनानी राजा राव तुलाराम के दादा राव तेज सिंह द्वारा वर्तमान छतरियों के स्थल पर उद्यान बनवाया गया था। शिल्प कौशल व संरचनात्मक अखंडता को दर्शाती इन छतरियों का स्वरूप इन्हें विशिष्टता प्रदान करता है। उन्होंने बताया कि पलवल जिला के आशा खेडा स्थित पुरातात्विक स्थल पर प्राचीन काल में पांडवों की संस्कृति से जुडाव के साक्ष्य मिले हैं, जो कुषाण, गुप्त और मध्यकालीन काल के बाद से आधुनिक काल तक अस्तित्व में रहा। इसी प्रकार अहरवां में प्राचीन धूसर मृदभांड संस्कृति से पूर्व के लोगों के बसने की संभावना हैं। उन्होंने बताया कि कोडला खेडा में प्रारंभिक लौह युग के आवासों के संकेत और 1200-600 ईसा पूर्व के मिट्टी के बर्तन पाए जाते थे, जो बाद में चीनी मिट्टी की परंपराओं के माध्यम से विकसित हुए। इस टीले की उपस्थिति व्यापक ब्रजभूमि में संरचित गांवों व छोटे समुदायों की तरफ इशारा करती है।—-
