जगदलपुर, 5 अक्टूबर । बस्तर दशहरा पर्व अपनी अनूठी परंपराओं और रस्मों के लिए विश्व प्रसिद्ध है, काछनगादी विधान में बस्तर दशहरा के निर्विध्न संपन्नता के आर्शिवाद के साथ ही शारदीय नवरात्र प्रारंभ हुआ था, वहीं 4 अक्टूबर काे काछन जात्रा के साथ ही 75 दिवसिय बस्तर दशहरा अपने अंतिम पड़ाव में पहुंच गया है।
आज रविवार 5 अक्टूबर काे ‘कुटुंब जात्रा विधान महात्मा गांधी स्कूल परिसर के गुड़ी में संपन्न हुई। इस रस्म के तहत पूरे बस्तर संभाग एवं पड़ोसी राज्य ओडिशा व महाराष्ट्र के समीपवर्ती गांव से पर्व में शामिल हुए हजारों देवी-देवताओं के छत्र और डोली को बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव की उपस्थिति में परंपरानुसार पूजा-अर्चना कर ससम्मान विदा किया। इसके बाद एक मात्र रस्म माता मावली की विदाई पूजा विधान 7 अक्टूबर के साथ ही बस्तर दशहरा 2025 आगामी वर्ष के लिए परायण हाे जायेगा। बस्तर दशहरा की सबसे खास बात यह है, कि इस पर्व में इतनी बड़ी संख्या में एक-एक गांव के देवी-देवताओं के प्रतीक छत्र, लाठ और डोली शामिल होते हैं, रियासत काल से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है।
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बस्तर दशहरा में शामिल हुए देवी-देवताओं को रूसूम (दक्षिणा/भेंट) देकर दी गई विदाई
परंपरानुसार, दशहरा पर्व में शामिल होने आए संभाग के सभी ग्राम के देवी-देवताओं को ‘रूसूम’ (दक्षिणा/भेंट) भी दी गई। दशहरा समिति ने देवी-देवताओं के छत्र और डोली लेकर पहुंचे पुजारियों को कपड़े, पैसे और मिठाइयां देकर उनकी ससम्मान विदाई की । शहर के गंगामुण्डा वार्ड में स्थित देवगुड़ी में श्रद्धालुओं ने अपनी मनोकामना अनुसार देवी-देवताओं को भेंट भी अर्पित किया। बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति की अगुवाई में संपन्न हुई। इस कुंटुब जात्रा रस्म के साथ ही, देवी देवता का आपस में मेल मिलाप देखते ही बन रहा था । देवी देवताओं के लाठ, डोली के साथ झुमते सिरहा और विभिन्न क्षेत्रों के आंगादेव आकर्षित किया। इस अवसर पर स्थानीय एवं आस-पास के गांव से पहुंचे श्रद्धालुओं ने देवी देवताओं का अपने परंपरा के अनुसार पूजा अर्चना कर उनका आशीर्वाद लिया।
