अगस्त क्रांति की शुरुआत 1942 में आठ अगस्त को हुई और कुछ दिनों बाद देश में कई जगहों पर उसका असर साफ तौर पर देखा गया। कुछ घटनाएं तो इतिहास में अमर हो गईं, जब कई जगह स्थानीय लोगों ने अपने को आजाद करा लिया और अपनी प्रशासनिक इकाइयां गठित कर लीं। अपने यहां जिले भर में हिंसक कार्रवाई के बाद 19 अगस्त को स्थानीय नेता चित्तू पाण्डेय को जिला कलेक्टर बनाए जाने के साथ बलिया स्वाधीन हो गया था। बाद में अंग्रेजी सेना और पुलिस के अमानुषिक अत्याचार से वहां की कुछ दिनों की आजादी का दमन कर दिया गया।
देश के पूरब में मेदिनीपुर और पश्चिम में सतारा जरूर लंबे समय तक आजाद रहे। फिर गांधी जी के कहने के बाद सम्पूर्ण देश के साथ एकजुटता के लिए वहां की सरकारें भंग की गईं। यहां देखना होगा कि मेदिनीपुर और सतारा के कुछ अंचलों में छापामार संघर्ष के बाद स्थानीय सरकारों ने सत्ता संभाली थी। बलिया थोड़ा अलग रहा, जहां अंग्रेजी सरकार के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को भी उसकी कुर्सी से हटाकर पूरे जिले की सुगठित सरकार बनाई गई। तब ‘स्वाधीन बलिया’ के पूरे जिले में मुख्यालय के आदेश माने गए।
वहां कलेक्टर के साथ ही पुलिस कप्तान, तहसीलदार और थानेदार की कुर्सियों पर भी स्थानीय नेता काबिज थे। हां, बलिया, मेदिनीपुर और सतारा, तीनों जगहों पर एक समानता थी। तीनों जगह सरकारी खजानों के धन से कर्मचारियों को वेतन आदि देने आदि का काम किया गया, तो आगे की व्यवस्था चलाने के लिए पंचायत, कृषि केंद्र और अन्य तंत्र स्थापित किए गए।
तत्कालीन बंबई (संप्रति मुंबई) के ग्वालिया टैंक मैदान, जिसे अब अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाता है, वहां अपने ऐतिहासिक भाषण के बाद महात्मा गांधी 1945 तक किसी सार्वजनिक सभा में नहीं बोले। कारण यह कि वे जेल में बंद थे। इसके बावजूद उस ऐतिहासिक भाषण ने ऐसा कर दिखाया, जो भारत की आजादी का मार्ग बन गया। गांधी और अन्य नेताओं की तरह देशभर में लोग गिरफ्तार होते रहे और उनकी जगह नए लोग आ खड़े हुए। स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह भाषण मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में कांग्रेस महासिमिति अधिवेशन के पहले दिन सात अगस्त को दिया गया था। इस भाषण में ‘करो या मरो’ और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव अगले दिन आठ अगस्त को पारित किया गया था।
ब्रिटिश सरकार की इंडिया वार कमेटी ने गांधी जी के सात अगस्त के भाषण के बाद करीब 24 घंटों तक इंतजार किया था। आठ अगस्त को अधिवेशन में गांधी जी के रखे प्रस्ताव के पारित होने के बाद रात में गांधी सहित तमाम बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। उस दौर में जब संचार के सीमित साधन थे, अगले दो दिन लोगों तक इस भाषण के मंतव्य पहुंचने में लगे थे।
फिर तो नौ और 10 अगस्त से ऐसा कुछ शुरू हुआ कि लोगों ने गांधी जी के आह्वान को अपने ढंग से लिया और विदेशी दासता को उखाड़ फेंकने के रास्ते पर चल पड़े। इसी का परिणाम था कि तब के संयुक्त प्रांत का बलिया, बंगाल का मेदिनीपुर और बंबई प्रांत का सतारा आजाद हो गया। यानी संपूर्ण देश की स्वतंत्रता के पांच अथवा साल साल पहले इन स्थानों ने एक रास्ता दिखाया। निश्चित ही यह रास्ता गांधी जी की अहिंसा का नहीं रह गया, पर बाद में गांधी जी ने भी माना कि ब्रिटिश अत्याचार की घटनाओं ने स्थानीय लोगों को हिंसा पर उतरने के लिए बाध्य कर दिया।
गांधी जी के करो या मरो के नारे के बाद 1942 के उस अगस्त में मिदनापुर का तामलूक और सतारा के कुछ हिस्से के लोगों ने बगावत कर दी। मिदनापुर के तामलूक में शुरुआती घटनाओं के बाद 17 दिसंबर,1942 से सितंबर,1944 तक जातीय सरकार (राष्ट्रीय सरकार) चलाई गई। तब राहत कार्य, स्कूलों को अनुदान, आपसी समझौते के लिए अदालतें बनाना और धनी लोगों के कुछ पैसे जरूरमंदों में बांटने तक के काम हुए। सतारा में ‘क्रांति सिंह’ नाना पाटिल भूमिगत रहते हुए लंबे समय तक समानांतर सरकार (पत्रि सरकार) का नेतृत्व करते रहे।
लोगों ने पुलिस को चकमा देकर हथियार ले लिए। गांवों में कमेटियां बनाकर सरकार के समानांतर काम किए गए। भौगोलिक स्थिति के कारण ये स्थान अंग्रेजों की पकड़ से दूर रहे। इसके विपरीत, बलिया में लोगों ने अंग्रेजों से सीधा मुकाबला किया। बलिया निवासियों ने कई जगह रेल लाइन उखाड़ फेंकी, थानों और कचहरियों पर कब्जे के बाद जिला मुख्यालय पहुंचकर जेल में बंद अपने नेताओं को रिहा कराया। फिर स्वाधीन बलिया की घोषणा हुई।
अगस्त क्रांति शुरू होने के बाद देश के कुछ अन्य हिस्सों में बगावत की कोशिशें हुईं। दरअसल, 1905 में जापान से रूस की पराजय, आयरलैंड का स्वतंत्रता संग्राम और 1917 में रूसी क्रांति ने 20वीं सदी की शुरुआत से ही औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत में भी सशस्त्र विद्रोह की आकांक्षा जगा दी थी। तभी स्वामी विवेकानंद, बंकिम चंद्र चटर्जी और लोकमान्य तिलक आदि मनीषियों के चलते धार्मिक पुनरुत्थानवाद ने भी जोर पकड़ा। इससे भारतीयों में अपनी सभ्यता के गौरव और फिर यूरोपीय शासकों के विरुद्ध आक्रोश बढ़ा।
यह जरूर हुआ कि गांधी जी के अहिंसक आंदोलन के चलते बंगाल और पंजाब जैसे हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष कम हुए। इसके बावजूद, यह आक्रोश सुलगता रहा और 1942 आते-आते महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले अहिंसक आंदोलन के दौरान भी एक हिंसक विद्रोह बन गया। इसी की परिणति अगस्त क्रांति के दौरान बलिया, मेदिनीपुर और सतारा में देखने को मिली। निश्चित ही ये स्थानीय बगावतें राष्ट्रीय महत्व की बन गईं और इन्होंने आजादी की राह आसान करने में मदद की।
(लेखक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एसोसिएट एडिटर हैं।)
