केरलम के सबरीमाला मंदिर सहित अन्य संप्रदाय के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। मस्जिद दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दलील दे रहे एडवोकेट नजाम पाशा ने कहा कि अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद सबके लिए खुली हो तो भी कोई जाकर घंटी नहीं बजा सकता। आरती नहीं कर सकता, क्योंकि उस जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा है। जो चीज सभी के लिए खुली है इसका मतलब ‘कुछ भी करने की छूट नहीं। कुरान बहुत संक्षिप्त है। उसमें हर प्रथा डिटेल में नहीं लिखी। पैगंबर की परंपरा भी धार्मिक प्रथा का हिस्सा है। मतलब सिर्फ किताब में लिखा होना ही “जरूरी अधिकार” तय नहीं करता। 23 अप्रैल को पिछली सुनवाई में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कोर्ट से कहा था कि इस्लाम महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने से नहीं रोकता है, लेकिन यह बेहतर है कि वे घर पर ही इबादत करें। 7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक सुनवाई हुई सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। पिछले 7 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए… 7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत 8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा 9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा 15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता 17 अप्रैल- SC बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी 21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं 22 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- हिंदू एकजुट रहें, संप्रदायों में बंटे नहीं
सुप्रीम कोर्ट में वकील बोले- मस्जिद सभी के लिए खुली:इसका मतलब वहां घंटी बजाकर पूजा नहीं कर सकते; ऐसी कई बातें जो कुरान में नहीं लिखीं
