मध्य प्रदेश के 20 जिलों में 77 करोड़ रुपए की 33 सरकारी संपत्तियों का मालिक वक्फ बोर्ड है। खास बात ये है कि वक्फ बोर्ड के नाम ये संपत्तियां कलेक्टरों की अनदेखी और लापरवाही की वजह से हुई हैं। ये खुलासा कैग ने किया है। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग (PWD) ने रायसेन जिले में साढ़े चार किलोमीटर लंबी सड़क ऐसी जगह बना दी, जो कुछ दिन बाद डूब क्षेत्र में आने वाला था। साथ ही विदिशा और नर्मदापुरम जिले में स्वीकृति से ज्यादा लंबी सड़क बनाकर सरकार को 15 करोड़ रुपए का चूना लगा दिया। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की निष्क्रियता की वजह से प्रदेश में अवैध कॉलोनियां पनप गईं, तो दूसरी तरफ इंदौर, भोपाल, उज्जैन, ग्वालियर और जबलपुर नगर निगम आश्रय शुल्क के रूप में जमा 260 करोड़ रुपए का हिसाब ही नहीं दे पाए। इन तमाम गड़बड़ियों का खुलासा नियंत्रक महालेखा परीक्षक यानी कैग (CAG) की रिपोर्ट से हुआ है। ये रिपोर्ट सरकार के 2018 से 2023 के बीच के कार्यकाल की है, जिसे 20 फरवरी को विधानसभा में पेश किया गया। कैग ने कुल 14 विभागों के कामकाज और योजनाओं की पड़ताल की है। पढ़िए, कैग ने कैसी गड़बड़ियां पकड़ीं… वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली का ऑडिट कलेक्टर्स ने सरकारी जमीन पर बनवाए क्रबिस्तान
कैग ने मप्र वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर भी ऑडिट किया। वक्फ की 81 संपत्तियों की जांच में पाया कि 20 जिलों की 33( 41 फीसदी) संपत्तियां जो दस्तावेजों में सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज थीं। उन्हें वक्फ की संपत्ति के रूप में रजिस्टर्ड किया गया। कैग ने रिपोर्ट में लिखा है कि इन 20 जिलों के कलेक्टरों ने संपत्तियों की रजिस्ट्री की प्रक्रिया को निरस्त करने करने के लिए कोई दिशा निर्देश जारी नहीं किए। सरकारी विभागों के इस रवैये की वजह से वक्फ एक्ट का दुरुपयोग हुआ बल्कि सरकारी जमीनों पर कब्जा हो गया।
सरकार का जवाब ये तकनीकि त्रुटि
सरकार ने अपने जवाब में बताया कि ये टेक्निकल मिस्टेक है। ये भी कहा कि वक्फ एक्ट में जिला प्रशासन से एनओसी लेने का कोई प्रोविजन नहीं है। जिला प्रशासन को हर संपत्ति के बारे में पता था। जब राजस्व रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण किया गया तो उस दौरान स्वामित्व के कॉलम में सरकारी संपत्ति दर्ज हुई। कैग ने कहा- सरकार का उत्तर गलत है
कैग ने सरकार के इस उत्तर को खारिज कर दिया और लिखा कि जिन संपत्तियों का परीक्षण किया उनमें से कुछ एक या दो साल पहले ही रजिस्टर्ड हुई हैं। साथ ही ये भी लिखा कि दो संपत्तियों पर कलेक्टरों की तरफ से आपत्ति दर्ज की गई थी इसके बाद भी वक्फ बोर्ड ने उन्हें बतौर वक्फ की संपत्ति दर्ज किया। ये भी लिखा कि जिन संपत्तियों को वक्फ ने अपना समझ लिया वो सामुदायिक प्रयोजन के लिए रिजर्व की गई थी। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की रिपोर्ट शहरों का विकास करने में नाकाम टीएंडसीपी
कैग ने टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (नगर तथा ग्राम निवेश) के लेखा परीक्षा के दौरान पांच बड़े शहरों में हुए प्लान्ड डेवलपमेंट को लेकर ऑडिट किया। ये ऑडिट 2018 से 2023 के बीच भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन नगर निगम में किया गया। इस दौरान 10 अहम बातें सामने आईं। इन दस बिंदुओं के अलावा दो और अहम पॉइंट्स 1. नगर निगमों ने आश्रय शुल्क के 260 करोड़ का हिसाब नहीं रखा
कैग ने ऑडिट के दौरान पाया कि कॉलोनाइजर्स के संबंधित नगर पालिका और नगर निगम को दिए गए अतिरिक्त आश्रय शुल्क को जमा करने के लिए अलग से बैंक खाता नहीं खोला गया, इसे सामान्य खातों में ही जमा कर लिया गया। इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर और उज्जैन नगर निगम ने कुल 259.17 करोड़ का आश्रय शुल्क जमा किया। कैग ने रिपोर्ट में लिखा कि अलग से बैंक खाते में ये शुल्क जमा न होने से ये पता नहीं लगाया जा सकता कि इसका इस्तेमाल कहां किया गया? केवल इंदौर नगर निगम ने कैग को बताया कि उन्होंने अलग से बैंक अकाउंट मेंटेन किया और करीब 163 करोड़ रुपए की राशि का इस्तेमाल प्रधानमंत्री आवास योजना के मकानों के निर्माण में किया गया। कैग ने इसे भी गलत मानते हुए लिखा कि पीएम आवास के लिए अलग से बजट होता है इसलिए आश्रय शुल्क का इस्तेमाल नगर पालिका अधिनियम 1998 के प्रावधानों के खिलाफ है। 2. टीएंडसीपी के पास अवैध निर्माण पता लगाने का सिस्टम नहीं
कैग ने ऑडिट के दौरान पाया कि आम लोगों ने कई जगह अवैध निर्माण और विकास की शिकायतें अधिकारियों से कीं। टीएंडसीपी ने उस एरिया का निरीक्षण करने या ऐसा अपना खुद का कोई मॉनिटरिंग सिस्टम डेवलप नहीं किया, जिससे अवैध निर्माण का पता लगाया जा सके। इसका नतीजा ये हुआ कि जो निवेश क्षेत्र थे, वहां अव्यवस्थित विकास हुआ। साथ ही अवैध कॉलोनियों पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। कैग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि भोपाल नगर निगम के ऑडिट के दौरान पाया गया कि 2020-21 के दौरान भोपाल कलेक्टर ने नगर निगम को 255 अवैध कॉलोनियों के बारे में बताया था और कार्रवाई के लिए पत्र भी लिखा था। भोपाल नगर निगम ने तीन साल बीतने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की। इसी तरह इंदौर, उज्जैन और ग्वालियर नगर निगम के दस्तावेजों के ऑडिट में पाया गया कि 1331 अवैध कॉलोनियों में से 479 कॉलोनियों को नगर निगमों ने रहने लायक बनाया। बाकी 852 रहने लायक नहीं थी, लेकिन कॉलोनाइजर्स के खिलाफ केवल एफआईआर दर्ज की गई। आगे क्या कार्रवाई हुई, ये पता नहीं चला। जबलपुर नगर निगम ने तो कॉलोनियों की डिटेल ही नहीं दी। स्कूल शिक्षा विभाग में छात्र टीचर अनुपात में अंतर टीकमगढ़ में एक टीचर के हवाले 112 छात्र
CAG की रिपोर्ट में पाया गया कि टीकमगढ़ के हायर सेकेंडरी (कक्षा 11वीं और 12वीं तक) स्कूलों में 112 छात्रों को सिर्फ एक टीचर पढ़ा रहा है जबकि राज्य का औसत 40 छात्रों पर एक टीचर का है। इसी तरह से राज्य के 79.8 छात्रों और अशोक नगर में 66 छात्रों पर एक टीचर पदस्थ है। रिपोर्ट में कहा गया कि प्राइमरी स्कूलों को छोड़कर बाकी श्रेणियों में टीचर पदस्थ नहीं किए गए। सात जिलों में टीचर-छात्र अनुपात औसत से ज्यादा
10 जिलों में स्थित स्कूलों के औसत पीटीआर (छात्र-टीचर अनुपात, 2018 से 2023 तक) के आगे किए गए सर्वेक्षण में यह पाया गया कि अशोक नगर, मंडला, रतलाम, सतना, शहडोल, शिवपुरी और टीकमगढ़ का पीटीआर राज्य के औसत पीटीआर से बहुत ज्यादा है। राज्य के मिडिल, सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूल में औसत पीटीआर क्रमश: 37:1, 40:1 और 54:1 है। इससे साफ है कि पांच जिले- अशोक नगर, रतलाम, शहडोल, शिवपुरी और टीकमगढ़ में मिडिल स्कूलों का पीटीआर राज्य के औसत 37:1 से अधिक है। इसमें टीकमगढ़ 57:1 के साथ सर्वाधिक है। सेकेंडरी स्तर पर अशोकनगर में 66:1 का पीटीआर दर्ज किया गया, जो राज्य के औसत 40:1 से 26 अंक अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2018-19 में स्कूलों की कुल संख्या 89 हजार 338 थी। जो वर्ष 2019-20 में घटकर 67,004 हो गई। यह 25% की गिरावट को दर्शाता है। यह गिरावट इसलिए आई, क्योंकि वर्ष 2019-20 में स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा संचालित प्राइमरी से लेकर हायर सेकेंडरी तक के सभी स्कूलों को एक परिसर, एक शाला स्कूल योजना के तहत एक छत के नीचे लाया गया था। पीडब्ल्यूडी विभाग की रिपोर्ट नर्मदापुरम-विदिशा में 24 किमी ज्यादा सड़क बना दी
कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि नर्मदापुरम की पांच और विदिशा की एक मुख्य सड़क (एमडीआर) स्वीकृति से 24 किलोमीटर अधिक बना दी। सड़क 103.50 किमी बननी थी, लेकिन बना दी गई 127.65 किमी। ये सड़कें एशियन डवलपमेंट बैंक (एडीबी) से लोन लेकर बनाई गईं। इन सड़कों का अतिरिक्त निर्माण लोन की शर्तों का उल्लघंन है। इससे 15.80 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि लोक निर्माण विभाग ने रायसेन जिले में एक सड़क डूब क्षेत्र में बना दी। उदयपुर–बामौरा–पठारी खंड से बीना नदी मार्ग तक 28.10 किलोमीटर सड़क निर्माण किया गया। इसमें से 23.60 किलोमीटर के हिस्से को एमडीआर (मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड) घोषित किया गया था। इस सड़क के निर्माण का अनुबंध सितंबर 2018 में 47.07 करोड़ की लागत से पूरा करने किया गया था जबकि इसी महीने जल संसाधन विभाग में सागर जिले में हनौता सिंचाई परियोजना के निर्माण के लिए प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की। यह जानते हुए भी कि इस सिंचाई परियोजना से सड़क का 4.40 किलोमीटर का हिस्सा डूब के क्षेत्र में आएगा, एनडीबी ने वैकल्पिक एलाइनमेंट की योजना बनाए बिना प्रोजेक्ट को जारी रखा। ब्लैक लिस्टेट फर्म की निगरानी का तंत्र नहीं
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि लोक निर्माण विभाग के पास ब्लैक लिस्टेट फर्मों की निगरानी करने का कोई भी तंत्र नहीं है। इसके चलते ब्लैक लिस्टेट निर्माण कंपनियां ठेके लेने में कामयाब हो रही हैं। ऐसा ही एक उदाहरण रिपोर्ट में दिया गया है। CAG ने मई 2023 में जांच के दौरान पाया कि विदिशा में मेसर्स केतन कंस्ट्रक्शन लिमिटेड को अगस्त 2018 में धीमी प्रगति और अन्य परियोजनाओं में 4 साल की देरी के कारण ब्लैक लिस्ट में डाल दिया गया था। यह फर्म टेंडर प्रक्रियाओं में भाग लेने के लिए अयोग्य थी। इस फर्म ने मेसर्स सोरठिया बेलजी रत्ना एंड कंपनी के साथ पार्टनरशिप कर ली। इसके बाद इसे सितंबर 2018 में 139.35 करोड़ रुपए मूल्य का एक अनुबंध प्रदान किया गया। इस प्रकार फर्म का सत्यापन निगरानी न किए जाने के कारण अयोग्य ब्लैकलिस्टेड किए गए ठेकेदार को दे दिया गया। ये खबर भी पढ़ें… MP सरकार का ज्ञानी बजट मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने अपने दूसरे बजट (2025-26) में GYAN यानी गरीब, युवा, अन्नदाता और नारी शक्ति पर जोर दिया था। इससे आगे बढ़कर 2026-27 का बजट GYANII हो गया है, यानी इसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री भी जुड़ गए हैं। इन छह सेक्टर्स पर ही बजट के 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होने हैं। पढ़ें पूरी खबर…
20 कलेक्टर्स ने सरकारी जमीन पर कराया कब्जा:MP में 77 करोड़ की 33 संपत्तियों का मालिक वक्फ बोर्ड; कैग की रिपोर्ट में खुलासा
