केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ बजाया जाएगा। इस दौरान वहां मौजूद हर युवक का खड़ा होना अनिवार्य होगा। वहीं, करीब 27 साल पहले इसी मुद्दे पर बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। झांसी के पूर्व विधायक और उत्तर प्रदेश सरकार में शिक्षा मंत्री रहे डॉ. रविन्द्र शुक्ल ने स्कूलों में ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य करने का फैसला लिया था। उस समय इस फैसले को लेकर राजनीतिक हलचल मच गई थी। बाद में उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया था। उस दौरान भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। ‘वंदे मातरम’ लागू होने के बाद दैनिक भास्कर से रविद्र शुक्ल ने बातचीत की। उन्होंने कहा- यदि सरकार उस समय ही स्पष्ट रुख अपना लेती, तो भाजपा को वनवास नहीं झेलना पड़ता और वह इतने लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर नहीं रहती। अब इसे पूरे देश में लागू किया गया है। देर से ही सही, लेकिन फैसला सही लिया गया है। अब पढ़िए पूर्व मंत्री का पूरा इंटरव्यू सवाल: ‘वंदे मातरम्’ गीत अब अनिवार्य कर दिया गया है। इसी मुद्दे पर आपको मंत्री पद भी गंवाना पड़ा था। इस पर आप क्या कहेंगे?
जवाब: देर आए दुरुस्त आए। मैं तो यह भी कहूंगा कि अगर उस समय उन्होंने स्पष्ट रुख अपना लिया होता, तो उन्हें (भाजपा को) वनवास में नहीं जाना पड़ता। उस समय वे दबाव में आ गए और फैसला वापस ले लिया। उसके अपने राजनीतिक कारण रहे होंगे, जिनकी विस्तार में मैं अभी नहीं जाना चाहूंगा। सवाल: जब आपने ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य किया था और उसके बाद काफी हंगामा हुआ था, वह मामला क्या था?
रविंद्र शुक्ल: जब यह विवाद बढ़ा, तब मुझसे कहा गया कि ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य करने के आदेश को बैक डेट में वापस ले लिया जाए, ताकि पूरा मामला शांत हो सके। उस समय लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव आ गया था। लोकसभा में उन्होंने कहा था कि ‘वंदे मातरम’ अनिवार्य नहीं है। लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भी यही कहा गया कि यह अनिवार्य नहीं है। बाद में उन्हें जानकारी हुई कि इसे अनिवार्य किया गया है, जिसके बाद पूरा विवाद खड़ा हुआ। सवाल: प्रदेश सरकार ने इस पर आपसे क्या कहा?
जवाब: मैं तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का बहुत आदर करता था, लेकिन उन्होंने यह कह दिया कि मुझे विश्वास में लिए बिना रविंद्र शुक्ल ने यह फैसला लिया। जबकि बाद में मैंने पत्रकारों के सामने वह फाइल रखी, जिस पर कल्याण सिंह के ही हस्ताक्षर थे। मेरे हस्ताक्षर उस पर नहीं थे, क्योंकि उस समय मेरी पत्नी ब्लड कैंसर से पीड़ित थीं। वह टाटा हॉस्पिटल, मुंबई में भर्ती थीं और मैं भी मुंबई में ही था। बजट में जब व्यवस्था की जानी थी, तब मैंने अपने प्रमुख सचिव को फोन कर कहा था कि वह “वंदे मातरम् अनिवार्यता” की फाइल मुख्यमंत्री के अनुमोदन के लिए भेज दें और उन्हें बता दें कि इस संबंध में मेरी फोन पर बात हो चुकी है। इसके बाद वह फाइल मुख्यमंत्री के पास गई और उसी कारण उस पर उनके हस्ताक्षर हुए, मेरे नहीं। बाद में जब मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया, तो मैंने प्रेस के सामने वह फाइल दिखाई और कहा कि देखिए, इस पर मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर हैं। सभी को फाइल की प्रति भी उपलब्ध कराई गई थी। सवाल: आपको मंत्री पद से कब हटाया गया?
जवाब: मुझे 4 दिसंबर 1998 को उस समय मंत्री पद से हटाया गया, जब मेरी पत्नी कैंसर से जूझ रही थीं। उनका हीमोग्लोबिन 4 पॉइंट पर आ गया था। डॉक्टरों ने कह दिया था कि वह बच नहीं पाएंगी। उसी दिन मुझे मंत्री पद से हटा दिया गया। मेरे पास बीबीसी लंदन से फोन आया कि आपको मंत्री पद से हटा दिया गया है, इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? मैंने कहा कि मैं सिद्धांतवादी व्यक्ति हूं, संघ का स्वयंसेवक हूं। मेरे लिए पद मायने नहीं रखता, यह बहुत छोटी चीज है। सवाल: अब जब वंदे मातरम् अनिवार्य हो गया है तो इस पर आपका क्या भाव है?
जवाब: मुझे गर्व है कि “वंदे मातरम्” गाते हुए अनेक लोगों ने स्वतंत्रता के लिए फांसी का फंदा चूमा। जब स्वतंत्र भारत में वंदे मातरम् का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें रविंद्र शुक्ल का नाम भी आएगा। कई लोगों ने इस प्रकरण को अपनी किताबों में भी लिखा है। अभी सदन में भी, भले नकारात्मक रूप में ही सही, लेकिन विपक्ष के सांसद कपिल सिब्बल हों या इकरा हसन, उन्होंने भी मेरा नाम लेकर कहा कि 27 साल पहले जब मंत्री रविंद्र शुक्ल को वंदे मातरम् के मुद्दे पर हटा दिया गया था, तो अब यह सही कैसे हो गया? अब वंदे मातरम् लागू हो गया है तो मुझे अत्यंत प्रसन्नता है। यह वैसा ही है जैसे कोई माली पेड़ लगाए और वह बड़ा होकर फल दे, या कोई बेटा बड़ा होकर होनहार बने, तब पिता को जो गर्व होता है, वही भावना आज मेरी है। सवाल: जितनी मुखरता से आप बोलते हैं, चाहे यूजीसी हो या वंदे मातरम् का मामला, झांसी के दूसरे भाजपा विधायक या नेता क्यों नहीं दिखते?
जवाब: मैंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। मेरे लिए राष्ट्र सर्वोपरि है। अगर मुझे मलाई खानी होती, तो मैं वंदे मातरम् का आदेश बैक डेट में वापस ले लेता। लेकिन मुझे पद या लाभ की लालसा नहीं है। सबके अपने-अपने सिद्धांत होते हैं। मेरे लिए मानवता, राष्ट्र और संस्कृति सर्वोपरि हैं। इसके लिए यदि सब कुछ त्यागना पड़े, तो मैं तैयार हूं। सवाल: अब यूजीसी पर आपका क्या रुख है?
जवाब: मुझे जो गलत लगेगा, मैं उसका खुलकर विरोध करूंगा। आज भी कहता हूं कि यदि यूजीसी कानून उसी स्वरूप में आएगा, तो मैं उसका विरोध करूंगा, सड़कों पर उतरूंगा और जनता के बीच जाऊंगा। आप ही (भाजपा) कहते थे “जात-पात की करो विदाई” और अब आप ही उसे कमजोर कर रहे हैं। सवाल: यूजीसी कानून किस सोच के साथ लाया गया है?
जवाब: हमारा उद्देश्य जात-पात की विदाई कर सभी को मानवता के धरातल पर एक साथ लाना था। लेकिन वोट बैंक की राजनीति के लिए आपने (भाजपा) समाज को फिर जातियों में बांट दिया। मानवता को सूली पर चढ़ा दिया। ——————- ये भी पढ़ें- यूपी में पंचायत चुनाव टलना तय, पहले बनेगा पिछड़ा आयोग:सरकार ने HC में हलफनामा दिया, सर्वे रिपोर्ट के बाद आरक्षण तय होगा यूपी में अप्रैल से जुलाई के बीच पंचायत चुनाव हो पाना मुश्किल है। चुनाव से पहले प्रदेश में एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग (OBC कमीशन) बनाया जाएगा। योगी सरकार ने लखनऊ हाईकोर्ट को इस बाबत हलफनामा दिया है। दरअसल, हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर मौजूदा पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकारों को चुनौती दी गई थी। जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पढ़िए पूरी खबर…
‘वंदे-मातरम् लागू किया तो BJP ने छीन लिया मंत्री पद’:झांसी में रविंद्र शुक्ल बोले- 27 साल पहले स्टैंड लेते तो भाजपा को वनवास नहीं होता
