पानीपत में 103 साल की ‘निरोग’ दादी का निधन:दावा-कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुई, पति की मौत के बाद अकेले संभाला परिवार; पोता HCS अधिकारी

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हरियाणा के पानीपत के गांव सुताना की सबसे बुजुर्ग महिला आशी देवी अब इस दुनिया में नहीं रहीं। समय की लंबी लकीर को अपने अनुभवों से सींचने वाली और एक सदी से भी अधिक का इतिहास अपनी आंखों में समेटने वाली आशा देवी का 103 साल की उम्र में निधन हो गया। 21 जनवरी को गांव में ही 13वीं की रस्म क्रिया होगी। आशा देवी अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं। उनके पौत्र सुशील कुमार यमुनानगर में जिला परिषद के सीईओ (HCS) अधिकारी है। सबसे खास बात ये कि वे अपनी जिंदगी में कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुई। बड़े बेटे कर्ण सिंह बताते है कि परिवार के लिए यह गर्व की बात थी कि 100 साल पार करने के बाद भी वे अपनी आंखों से स्पष्ट देख सकती थीं और उनकी याददाश्त आखिरी समय तक वैसी ही बनी रही। उनका सादा खान-पान और ग्रामीण जीवनशैली ही उनकी लंबी उम्र का राज था। गांव के लोगों का कहना है कि आशा देवी का निधन केवल एक परिवार की क्षति नहीं है, बल्कि उस आखिरी पीढ़ी का विदा होना भी है, जिसने भारत को गुलामी से आजादी और फिर आधुनिकता के शिखर तक पहुंचते देखा। पहले यहां पढ़िए, आशी देवी के जीवन के बारे में… गांव सुताना की माटी और फौलादी सेहत
आशी देवी का जन्म और जीवन गांव सुताना की उसी माटी में बीता, जहां मेहनत और सादगी ही जीवन का आधार थी। उनके बड़े बेटे कर्ण सिंह ने बताया कि मां की उम्र भले ही 103 साल हो गई थी, लेकिन उनकी सेहत किसी फौलाद से कम नहीं थी। “आज के दौर में जहां लोग 40 की उम्र में ही दर्जनों बीमारियों और दवाइयों के घेरे में आ जाते हैं, मां ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी अस्पताल का मुंह नहीं देखा था। उन्हें कभी कोई गंभीर बीमारी नहीं हुई, न ही कभी उन्हें भर्ती कराने की नौबत आई। 1982 में थमा था हमसफर का साथ, पर नहीं हारा हौसला
आशी देवी के जीवन का सबसे कठिन दौर साल 1982 में आया था, जब उनके पति का बीमारी के कारण निधन हो गया। आज से ठीक 42 साल पहले जब पति का साथ छूटा, तो परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। तीन बेटों कर्ण सिंह, बलबीर सिंह और राजपाल सिंह को पालना और ऊंचे संस्कार देना किसी तपस्या से कम नहीं था। मगर, आशी देवी ने कभी हार नहीं मानी और एक वटवृक्ष की तरह पूरे परिवार को अपनी छाया में सुरक्षित रखा। 2 पॉइंट में जानिए, कैसे हुआ उनका निधन… फर्श से अर्श तक पहुंचा परिवार…
आशी देवी ने अपने जीवनकाल में केवल समय ही नहीं बदला, बल्कि अपने परिवार की किस्मत को भी बदलते देखा। उनके संघर्षों का ही परिणाम है कि आज उनके पोते-पोतियां उच्च पदों पर आसीन हैं। गांव सुताना के लोग बताते हैं कि आशी देवी अपने पोते सुशील के HCS अधिकारी बनने पर बेहद गौरवान्वित महसूस करती थीं। ग्रामीण बोले- एक जीवंत अध्याय का समापन
गांव के लोगों का कहना है कि आशी देवी का जाना केवल एक परिवार की बुजुर्ग का जाना नहीं है, बल्कि गांव सुताना के इतिहास के एक जीवंत अध्याय का समापन है। उन्होंने अपनी मेहनत से जो पौध लगाई थी, आज वह प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर एक विशाल वृक्ष बन चुकी है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता है कि सादगी, अनुशासन और मजबूत इच्छाशक्ति से न केवल लंबी उम्र पाई जा सकती है, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी परिवार को सफलता के शिखर पर पहुँचाया जा सकता है। ————— ये खबर भी पढ़ें… हरियाणा की 77 साल की रॉकिंग दादी:15 फीट गहरी नहर में पुल से लगातीं छलांग, हरकी पैड़ी में गंगा पार कर चुकीं; 2 जानें भी बचाईं यूपी के बागपत के जोहड़ी गांव की शूटर दादी चंद्रो और प्रकाशी तोमर के किस्से तो आपने सुने ही होंगे कि कैसे दोनों ने वृद्धावस्था में भी दुनिया में अपनी छाप छोड़ी। चलिए, हम आपको हरियाणा की एक ऐसी ही दादी साबो देवी से मिलवाते हैं, जो 77 साल की उम्र में भी अपने रॉकिंग स्टाइल से धूम मचा रही हैं। (पूरी खबर पढ़ें)