देश के तीन राज्यों उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ ने अपनी स्थापना के 25 वसंत पूरे कर लिए हैं। 1 नवंबर 2000 को ये तीनों राज्य अस्तित्व में आए थे। यह और बात है कि प्रगति के मामले में ये राज्य, उन राज्यों को चुनौती दे रहे हैं जिनसे अलग होकर ये अस्तित्व में आए। 25 साल का समय वैसे तो बहुत ज्यादा नहीं होता लेकिन अगर दूरदर्शिता और लगन से काम किया जाए तो हालात बदले जा सकते हैं। देश में समय-समय पर नये राज्यों की मांग के पीछे कमोबेश यही तर्क उठता रहा कि छोटे राज्य बनने पर वहां बेहतर प्रशासन तो होगा ही, उनका प्रमुखता से विकास भी हो सकेगा। तीनों राज्यों के 25 साल के अनुभव इस तथ्य पर मुहर लगाते नजर आते हैं।
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में प्रचुर प्राकृतिक संपदा है लेकिन इसका लाभ राज्य के पुनर्गठन से पूर्व स्थानीय लोगों को कितना मिल पाता था, यह किसी से छिपा नहीं है। इसी तरह झारखंड की खनिज संपदा का लाभ बिहार को मिलता था। उत्तराखंड के शासन की कमान वहां से 600 किलोमीटर दूर लखनऊ के हाथ में हुआ करती थी। राजधानी दूर होने की पीड़ा से तीनों ही राज्यों के नागरिक जूझ रहे थे। इन तीनों राज्यों के निर्माण के पीछे जो उभयनिष्ठ भावना थी, वह यह कि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश का उस समय दायरा बहुत बड़ा था। इससे वहां क्षेत्रीय असंतुलन, राजधानी की दूरी, विकास की कच्छप गति और स्थानीय संस्कृति एवं पहचान की उपेक्षा सामान्य बात थी लेकिन नए राज्यों के गठन के बाद तीनों राज्यों ने प्रमुखता के साथ विकास के क्षेत्र में फर्राटे भरे हैं।
देश में बिजली उत्पादन में छत्तीसगढ़ जहां नौंवे स्थान पर पहुंच गया है, वहीं उसकी बेरोजगारी दर जहां 2001 में 5.8 प्रतिशत और गरीबी दर 49.4 प्रतिशत थी। अब यह घटकर क्रमश: 2.4 और 17.9 प्रतिशत हो गई है जबकि यहां की प्रति व्यक्ति आय भी वर्ष 2001 के मुकाबले वर्ष 2025 में 12240 रुपये से बढ़कर 1.40 लाख रुपये हो गई है। मध्य प्रदेश में बेरोजगारी दर तब 2.3 प्रतिशत और गरीबी दर 48.6 प्रतिशत थी। आज छत्तीसगढ़ की बेरोजगारी दर आधी से ज्यादा घटकर 20.6 प्रतिशत रह गई है। राज्य स्वास्थ्य सूचकांक के लिहाज से देखें तो छत्तीसगढ़ भारत के 10 शीर्ष राज्यों में है।
उत्तराखंड
बिजली उपलब्धता के क्षेत्र में उत्तराखंड इतिहास रच रहा है। उत्तराखंड जब बना था तो वहां 65 प्रतिशत घरों में बिजली थी, आज 99 प्रतिशत से अधिक घरों में बिजली आपूर्ति हो रही है। उत्तराखंड का सड़क संजाल 84 प्रतिशत तक बढ़ा है। उत्तराखंड में बजट का आकार भी 30 गुना तक बढ़ गया है। पर्यटन, उत्पादन और सेवा क्षेत्र में यहां जबरदस्त सुधार हुआ है। राज्य की सकल घरेलू आय का 14 फीसद हिस्सा पर्यटन से प्राप्त होता है। अविभाजित उत्तर प्रदेश के हालात पर विचार करें तो उस समय वहां गरीबी दर 41 प्रतिशत थी, जो अब 23 प्रतिशत है जबकि उत्तराखंड में गरीबी दर 8.6 फीसद है। पुनर्गठन के आरंभिक साल में उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 15 हजार के करीब थी, आज यह बढ़कर दो लाख सत्ताईस हजार हो गई है। मतलब राष्ट्रीय औसत आय से लगभग दोगुनी।
वर्ष 2002-03 में उत्तराखंड की पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार के मुखिया एनडी तिवारी ने 5,880 करोड़ रुपये का वार्षिक बजट प्रस्तुत किया था। यह राज्य के रूप में उत्तराखंड की पहली बड़ी वित्तीय योजना थी। इसके बाद 25 वर्षों के दौरान बजट का आकार निरंतर बढ़ता गया और इस वर्ष 2025-26 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने 1,01,175 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तुत किया है। इस दौरान राज्य की वित्तीय नीतियों, उद्योगों और पर्यटन क्षेत्र में निवेश ने आर्थिक ढांचे को निश्चित रूप से अभिनव दिशा दी है। इन 25 वर्षों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। सच तो यह है कि उत्तराखंड अब आर्थिक प्रगति के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में शुमार हो गया है। राज्य की स्थापना के वक्त उत्तराखंड में बढ़ता शहरीकरण काबिले तारीफ है लेकिन इसके अपने भविष्य के खतरे भी हैं। नीति नियंताओं को अभी से इस पर विचार करके आगे बढ़ना होगा। राज्य में कुल 63 शहर थे, जो अब बढ़कर 110 हो गए हैं। राज्य में शहरों के खाते में अगर कई उपलब्धियां हैं, तो अनेक चुनौतियां भी हैं। इस बात को नकारा नहीं जा सकता। जिस तेजी के साथ पर्यटकों की तादाद बढ़ी है, उसे संभाल पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। सरकार को देर-सबेर इसका हल तो निकालना ही होगा।
झारखंड
बिहार के दक्षिणी जिलों को काटकर बनाए गए झारखंड ने भी 25 साल में बेमिसाल तरक्की की है। आज वह घरेलू पर्यटन में बिहार से कहीं आगे खड़ा है। खनन से उसकी आय देश के किसी भी राज्य से सर्वाधिक ज्यादा है। उसके पूंजीगत व्यय पर गौर करें तो वह देश के औसत से डेढ़ गुना है। झारखंड का बजट विगत 25 साल में 13 गुना बढ़ गया है। अगर यह कहें कि झारखंड की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। झारखंड की प्रशासनिक क्षमता का विस्तार 18 से 24 जिलों तक हुआ है। पूरे प्रदेश में सड़कों का जाल बिछ गया है। बिजली और संचार व्यवस्था में अभूतपूर्व बदलाव आया है। इससे आम जनजीवन सरल और सहज हुआ है। रांची, देवघर, और बोकारो जैसे महत्वपूर्ण शहर हवाई मार्ग से जुड़ चुके हैं। झारखंड के राष्ट्रीय मानचित्र पर तेजी से उभरने का प्रमाण है। यह और बात है कि कोयला राजधानी धनबाद को अभी भी एयरपोर्ट जैसी बुनियादी सुविधा का इंतजार है। देवघर का बाबाधाम, पारसनाथ, नेतरहाट, और रजरप्पा जैसे स्थल कोल्हान और छोटानागपुर की प्राकृतिक सुंदरता के लिहाज से देश- दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर रहे हैं और राज्य के पर्यटन राजस्व का बड़ा स्रोत बने हुए हैं।
नये राज्यों ने दिखाई नई राह
नवनिर्मित राज्यों ने विगत 25 साल में देश को दिखा दिया है कि वे बेरोजगारी पर अंकुश लगा सकते हैं तो साक्षरता दर में इजाफा भी कर सकते हैं। आय के नए साधन, संसाधन, के स्रोत तलाश सकते हैं और अपनी अर्थव्यवस्था में चार चांद लगा सकते हैं लेकिन इन नए राज्यों के सामने अपनी चुनौतियां भी है। उत्तराखंड को हर साल प्राकृतिक चुनौतियों से रूबरू होना पड़ता है लेकिन क्या वह इन चुनौतियों से निपटना सीख पाया है, यह अपने आप में अहम सवाल है। पर्वतीय और तराई क्षेत्रों के बीच आय की असमानता और गांवों तक संपर्क सुविधा बनाने का काम अभी भी उसे करना है। निर्विवाद रूप से कहना होगा कि शिक्षा क्षेत्र में वह झारखंड और छत्तीसगढ़ से बहुत आगे है। आज उत्तराखंड के पास चार केंद्रीय विश्वविद्यालय, पांच राज्य विश्वविद्यालय, चार डीम्ड विश्वविद्यालय और पांच निजी विश्वविद्यालय हैं। उसके अनेक शिक्षा संस्थान तो देश-विदेश में काफी अहमियत रखते हैं। रुड़की विश्वविद्यालय और पं. गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ख्याति और प्रतिष्ठा पूरे एशिया में है।
कुल मिलाकर विचार करें तो नए बने इन तीन राज्यों ने देश को सीख दी है कि विकास के लिए बड़े राज्यों को छोटे-छोटे राज्यों में बांटकर विकास को कहीं अधिक व्यवस्थित रूप में हस्तगत किया जा सकता है।
