मधुमक्खियों के आगे 25 बच्चों की ढाल बनी…जान भी गंवाई:प्रशासन ने बुजुर्ग कंचनदेवी की बहादुरी को नकारा; अफसर कह रहे- टीचर ने जान बचाई

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दादी हमको पानी पिला रही थी। तभी मधुमक्खियों ने हमला कर दिया, तो दादी ने हमें कंबल से ढक दिया। तीन-चार बच्चों पर भी मधुमक्खियों ने हमला किया। कुछ देर बाद हमने देखा तो दादी जमीन पर पड़ी थी। ये कहते हुए आठ साल की मासूम जीविका की आंखें नम हो जाती है। न केवल जीविका बल्कि नीमच जिले के रानापुर गांव के हर बाशिंदे की आंखें नम हैं। हर कोई स्वसहायता समूह की अध्यक्ष और आंगनबाड़ी में बच्चों को खाना बनाकर खिलाने वाली कंचनबाई की बहादुरी को सलाम कर रहा है। दरअसल, कंचनबाई ने अपनी जान देकर 25 बच्चों की जान बचाई है। 2 फरवरी को जब वो आंगनबाड़ी के बच्चों को खाना खिलाकर हैंडपंप के पास पानी पिलाने ले गई तो उसी के सामने लगे पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता था। मक्खियों ने हमला किया। कोई कुछ समझता उससे पहले कंचन बाई ने अपनी साड़ी उतारी और बच्चों की तरफ दौड़ लगा दी, बच्चों को ढका। जब इससे भी बात नहीं बनी तो आंगनबाड़ी भवन के अंदर दरी-चटाई बच्चों को ओढ़ा दी थी। कंचनबाई के उठावने के दिन जब भास्कर की टीम रानापुर गांव पहुंची तो ग्रामीण इस बात से गुस्से में नजर आए कि कोई भी प्रशासनिक अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। भास्कर रिपोर्टर ने प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क किया, तो उस समय जिले की महिला बाल विकास अधिकारी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके बाद में एक लिखित बयान जारी कर कंचनबाई की बहादुरी को नकार दिया । बयान में कहा गया है कि कंचन बाई ने नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ा रही टीचर ने बच्चों की जान बचाई। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… गांव में दहशत, आंगनबाड़ी पर ताला और हैंडपंप सूना
नीमच से 36 किलोमीटर दूर, मड़ावदा ग्राम पंचायत का एक छोटा सा गांव है रानपुर। यहां की आबादी बमुश्किल 200 लोगों की है। गांव में घुसते ही सड़क निर्माण का अधूरा काम और कीचड़ आपका स्वागत करता है। एक तरफ वही आंगनबाड़ी है, जिस पर अब ताला लटका है। दूसरी तरफ वह गांव है, जहां मौत का सन्नाटा पसरा है। हादसे के बाद से गांव में ऐसी दहशत है कि लोग आंगनबाड़ी की तरफ जाने से भी डर रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती पीने के पानी की है, क्योंकि पूरे गांव का एकमात्र हैंडपंप आंगनबाड़ी के पास ही है। हादसे के बाद से वहां कोई पानी भरने नहीं गया। बच्चों के मन में डर इस कदर बैठ गया है कि वे स्कूल का नाम सुनकर ही सिहर उठते हैं। भास्कर टीम ने जब कुछ बच्चों से बात करने की कोशिश की, तो वे रोने लगे और बस एक ही रट लगाए हुए थे, अब हमें स्कूल नहीं जाना। मधुमक्खियों के हमले में गांव के चार-पांच बच्चे घायल हुए थे, जिन्हें मामूली चोटें आई हैं। ग्रामीण बोले- वो नाम के मुताबिक सोने जैसे दिल की थी
इसी गांव की संकरी गलियों के आखिरी छोर पर कंचन बाई का कच्चा-पक्का घर है। घर में लकवे से जूझ रहे उनके पति और गरीबी में लिपटा उनका परिवार रहता है। कंचन बाई इस परिवार की अकेली कमाने वाली सदस्य थीं। वह स्व-सहायता समूह से जुड़कर आंगनबाड़ी में बच्चों के लिए खाना बनाती थीं। इससे मिलने वाले मामूली मानदेय से वह न सिर्फ बीमार पति का इलाज कराती थीं, बल्कि परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का भी इंतजाम करती थीं। जब भास्कर की टीम कंचन बाई के घर पहुंची तो उनके उठावने का कार्यक्रम चल रहा था। उनके घर के बाहर सैकड़ों लोग जमा थे। कंधे पर उठाया तब तक मुंह से झाग निकल रहा था
कंचन बाई के उठावने में ही मिले घटना के प्रत्यक्षदर्शी दिलीप मेघवाल। वह उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए कांप उठते हैं। वह बताते हैं, उस दिन दोपहर करीब 3:30 बजे मैं गांव की ओर जा रहा था। तभी बच्चों के चीखने-चिल्लाने की तेज आवाज आई। मैं आंगनबाड़ी की तरफ भागा। वहां का दृश्य दिल दहला देने वाला था। मधुमक्खियों का एक पूरा झुंड बच्चों पर हमला कर रहा था। मैंने कपड़े से अपना मुंह ढका और अंदर की ओर बढ़ा। दिलीप आगे बताते हैं, मैंने देखा कि कंचन बाई ने अपनी साड़ी और दरी से बच्चों को ढंक रखा था। बच्चों को पढ़ा रही मैडम भी घबराई हुई थीं और बच्चों को बचाने की कोशिश कर रही थीं। कंचन बाई का शरीर खुला था और वह बच्चों के ऊपर एक कवच की तरह लेटी हुई थीं। सारी मधुमक्खियां उन्हीं पर हमला कर रही थीं। मेरे पहुंचते ही वह जमीन पर गिर पड़ीं। हमने कुछ मधुमक्खियों को हटाया और सबसे पहले कंचन बाई को कंधे पर उठाकर बाहर लाए। तब तक उनके मुंह से झाग और नाक से खून निकलने लगा था। गांव के युवाओं ने 112 पर कॉल किया, जो 15-20 मिनट में पहुंच गई। कंचन बाई को सरवानिया महाराज के अस्पताल लेकर गए, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हादसे के बाद मधुमक्खियां और आक्रामक
हादसे को दो दिन बीत चुके हैं, लेकिन मधुमक्खियों का आतंक कम नहीं हुआ है। जब भास्कर टीम कुछ साहसी युवकों के साथ आंगनबाड़ी की तरफ बढ़ी, तो मधुमक्खियों ने हम पर भी हमला कर दिया। हमने और ग्रामीणों ने आंगनबाड़ी भवन के पीछे छिपकर अपनी जान बचाई। ग्रामीणों ने बताया कि हादसे के बाद से मधुमक्खियां और भी आक्रामक हो गई हैं और दिन में 5-7 बार हमला कर देती हैं। एक ग्रामीण ने हमें आंगनबाड़ी के पास एक घनी झाड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा, वहां है छत्ता। जैसे ही हमने उस तरफ उंगली उठाई, उसने तुरंत हमारा हाथ नीचे करते हुए कहा अंगुली मत दिखाओ, इससे वे भड़क जाती हैं। कुछ ही सेकेंड में ग्रामीण हमें खींचकर हैंडपंप से दूर ले आए और बोले, ये गुस्से में हैं, कभी भी हमला कर सकती हैं। ग्रामीणों ने यह भी बताया कि गांव के बीच में एक बड़े पेड़ पर भी मधुमक्खियों का एक और बड़ा छत्ता है, जिससे एक और हादसे का डर उन्हें हर पल सता रहा है। आंगनबाड़ी के अंदर बिखरी दहशत की निशानियां
मधुमक्खियों के हमले की दहशत सिर्फ इंसानों में नहीं, बल्कि उस आंगनबाड़ी की दीवारों में भी कैद है। जब एक ग्रामीण ने हिम्मत करके भवन का ताला खोला, तो अंदर का मंजर उस दिन के संघर्ष की गवाही दे रहा था। कमरे में चारों तरफ बच्चों की किताबें, बस्ते और पानी की बोतलें बिखरी पड़ी थीं। चटाइयां अस्त-व्यस्त थीं। फर्श पर मरी हुई मधुमक्खियों के अवशेष थे। कमरे की हालत देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि उन 15 मिनटों में वहां क्या कयामत बरपी होगी और कंचन बाई ने किस असाधारण जज्बे का परिचय दिया होगा। मेरी मां ने दूसरी मांओं की गोद उजड़ने से बचा ली
हादसे के दो दिन बाद भी प्रशासन या किसी जनप्रतिनिधि का परिवार की सुध लेने न पहुंचना, उनके आक्रोश का सबसे बड़ा कारण है। परिवार की महिलाएं कहती हैं, कंचन बाई ने 25 बच्चों की जान बचाई, लेकिन न तो शिक्षा विभाग का कोई अधिकारी आया और न ही महिला बाल विकास विभाग का। कंचन बाई के बेटे रवि का गला रुंधा हुआ है, लेकिन उसकी आंखों में अपनी मां के लिए गर्व है। वह कहता है, दो दिन पहले तक सब ठीक था। घर में मुश्किलें थीं, पर मां की वजह से हम हर मुश्किल का सामना कर रहे थे। इस हादसे का दुख तो है, पर मन में एक शांति भी है कि मेरी मां ने दूसरी मांओं की गोद उजड़ने से बचा ली। भगवान सब देख रहा है, न्याय तो वहीं होता है। सरपंच बोले-मदद दिलाने का प्रयास कर रहा हूं
सरपंच लालाराम रावत इस घटना से बेहद दुखी हैं। वह कहते हैं, कंचन बाई बहुत संघर्षशील महिला थीं। इस हादसे ने पूरे गांव को झकझोर दिया है। मेरा पहला प्रयास गांव में मौजूद मधुमक्खियों के छत्तों को सुरक्षित रूप से हटाने का है। मैं विधायक जी और अधिकारियों से मिलकर परिवार को हरसंभव आर्थिक मदद दिलाने की मांग करूंगा। प्रशासन बोला- कंचनबाई ने नहीं दिखाई बहादुरी
भास्कर ने जब इस पूरे मामले को लेकर कलेक्टर से बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। इसके बाद जिले की महिला बाल विकास अधिकारी अंकिता पांडे से मिले, तो उन्होंने कैमरे के सामने कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया। कुछ देर बाद महिला बाल विकास अधिकारी अंकिता पंड्या पांडे ने एक लिखित बयान जारी किया। इस बयान के मुताबिक 2 फरवरी को कंचनबाई आंगनबाड़ी भवन से 50 मीटर दूर बने हैंडपंप पर कपड़े धो रही थी उनके दोनों बच्चे पास ही खेल रहे थे। उसी समय मधुमक्खियों ने हमला किया। हमले से बचने वह आंगनबाड़ी भवन की तरफ दौड़ी। इससे मक्खियां आंगनबाड़ी की तरफ आने लगी। उस समय आंगनबाड़ी में प्रायमरी स्कूल की कक्षा लगी थी। प्राइमरी टीचर मंगला मालवीय ने मधुमक्खियों को आता देख क्लासरूम में मौजूद 20 बच्चों को दरी व तिरपाल से ढक दिया जिससे कि वह सुरक्षित रहे। दोपहर 03:30 बजे कोई भी आंगनबाड़ी केंद्र का बच्चा वहां पर मौजूद नहीं था बल्कि शाला चल रही थी। आंगनबाड़ी में बच्चों की मौजूदगी का समय दोपहर 1 बजे तक ही है। ये खबर भी पढ़ें…
आंगनबाड़ी के बच्चों को मधुमक्खियों से बचाने दे दी जान नीमच में आंगनबाड़ी केंद्र पर मधुमक्खियों ने हमला कर दिया। बच्चों को उनसे बचाने के लिए केंद्र में खाना बनाने वाले स्वसहायता समूह की अध्यक्ष कंचन बाई मेघवाल मधुमक्खियों के सामने खड़ी हो गईं। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना सभी बच्चों को तिरपाल और दरी में लपेटा। फिर अंदर के कमरे में भेजा। पढ़ें पूरी खबर…